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इंडो यू. एस. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का इतिहास एवं बराक ओबामा

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भारत यू.एस विदेश नीति एवं राष्ट्रपति बराक ओबामा
प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व अमेरिकन विदेश नीति का आधार मुनरो डोक्टरिन था विश्व के किसी भी मामले में अमेरिका हस्तक्षेप का इच्छुक नहीं था पहली बार राष्ट्रपति विल्सन ने प्रथम विश्व युद्ध में मित्र देश की सेनाओं की और से विश्व युद्ध में भाग लिया युद्ध समाप्ति के बाद लीग आफ नेशन की स्थापना में उनका सबसे बड़ा हाथ था की लेकिन अमेरिकन कांग्रेस ने राष्ट्रपति विल्सन को लीग आफ नेशन की सदस्यता ग्रहण नहीं करने दी| द्वितीय युद्ध में अमेरिका नें विश्व युद्ध में भाग ले कर फिर युद्ध का रुख ही पलट दिया मित्र राष्ट्रों की विजय हुई अब बात बदल गयी थी अमेरिका के प्रयत्नों से संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई और सुरक्षा परिषद का यू.एस स्थायी मेम्बर है |
१५ फरवरी १९४२ सिंगापुर को जापान के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा ,और ८मार्च रंगून भी समर्पण करने के लिए विवश हो गया युद्ध खतरा अब भारत की पूर्वी सीमा बढ़ गया अमेरिकन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने ब्रिटिश सरकार पर दबाब डाला भारतीय नेताओं के साथ मिल के भारत की आजादी का हल निकाला जाये जिससे भारत खुल कर दूसरे विश्व युद्ध में भाग ले सके | राष्ट्रपति रूजवेल्ट के प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप क्रिप्स मिशन को चर्चिल ने वार्ता लाप करने भारत भेजा परन्तु वह आजादी का कोइ निष्कर्ष नही निकाल सका द्वितीय युद्ध की समाप्ति के बाद फिर से अमेरिकन दबाब ब्रिटिश भारत पर बढ़ा ब्रिटेन के लिए भी अब भारत पर अपना साम्राज्य बनाये रखना सम्भव नहीं था|
भारत आजाद हो गया यह साफ़ लग रहा था भारत और अमेरिका के सम्बन्ध बढ़ेगे लेकिन नेहरूजी का झुकाव समाज वादी व्यवस्था की और अधिक था वह सोवियत रशिया के अधिक समीप थे |नेहरु जी ने गुटनिरपेक्षता की नीति को विदेश नीति का आधार बनाया विश्व को पंचशील का सिद्धांत दिया ,विश्व के अनेक झगड़ों को निपटाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की | यू.एस के सेक्रेटरी आफ स्टेट डलस ने सीटो (SEATO और बगदाद पैक्ट द्वारा सोवियत रशिया और कम्युनिस्ट चीन के खिलाफ देशों का मजबूत संगठन बनाया पाकिस्तान भारत के विरुद्ध अपने को मजबूत करने के लिए मिलिट्री पैक्ट का सदस्य बना लेकिन हम इस गुट बाजी की नीति से दूर रहे| |डलस के समय यू.एस नीति का झुकाव पाकिस्तान की और अधिक था ०|डलस भारत की गुट निरपेक्षता की नीति को पसंद नहीं करता था| डलस का युग समाप्त हो गया| १९५९ में आइजनहावर पहले अमेरिकन राष्ट्रपति थे जिन्होंने भारत की यात्रा की कानपुर IITमें पहला कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट खोला गया |बेशक भारत यू.एस के साथ मिलिट्री पैक्ट का मेम्बर नही था सूखा और बाढ़ की स्थिति में भारत को आर्थिक और मुफ्त में अन्न आदि की सहायता लगातार देता रहा
| राष्ट्रपति कनेडी के सत्ता में आते – आते अमेरिकन विदेश नीति में बदलाव आया वह एशिया में भारत के महत्व को समझते थे अत : वह गुटनिरपेक्ष भारत के समीप आ गये अब पाकिस्तान की कश्मीर नीति का समर्थन भी कम हो गया १९६२ में चीन ने भारत की सीमाओं पर हमला कर दिया चीन से युद्ध की स्थिति से निपटने के लिए गोला बारूद और, हथियारों तथा वस्त्र भेज कर अमेरिका ने हमारी मदद की लेकिन पाकिस्तान को आश्वासन दिया गया एंग्लो अमेरिकन सैन्य मदद केवल चीन के खिलाफ है|कनेडी की हत्या के बाद मनोनीत राष्ट्रपति निक्सन पाकिस्तान के अधिक करीब थे उन्होंने १९७१ के भारत पाक युद्ध में पकिस्तान का खुले रूप में समर्थन किया इंदिरा जी ने बंगला देश की समस्या से निपटने के सोवियत रूस से समझौता किया लेकिन भारत को डराने के लिए अमेरिकन जंगी बेडा बंगाल की खाड़ी में खड़ा कर दिया |
१९७४ में इंदिरा जी के नेत्रत्व में भारत ने पहला अपना पहला सफल परमाणु परिक्षण किया जिसका यू एस में जम कर विरोध किया गया|इंदिरा जी मोरार जी देसाई के बाद फिर से प्रधानमन्त्री बनी वह कूटनीत की माहिर थी अपनी अमेरिकन यात्रा के दौरान भारत की नीतियों से अमेरिकन सीनेटरों को प्रभावित करने की पूरी कोशिश की | १९८० के बाद सोवियत यूनियन द्वारा अद्गानिस्तान के कब्जे को लेकर राष्ट्रपति रीगन भारत के करीब आये जिससे भारत को सीमित आर्थिक के साथ सैन्य सहायता प्रदान की गई |अटल बिहारी जी के कार्य काल में दूसरा परमाणु परिक्षण हुआ अमेरिका ने भारत पर आर्थिक और कई प्रतिबन्ध लगा दिए इन प्रतिबंधों को जापान के अलावा किसी ने नहीं माना यह भारत के आर्थिक उत्थान का समय था देश की ग्रोथ रेट बढ़ रही थी जल्दी ही भारत और अमेरिका के सम्बन्धों में सुधार आया प्रतिबन्ध भी धीरे-धीरे समाप्त हो गये, क्लिंटन ने भारत की यात्रा की | मनमोहन सिह के काल में ऊर्जा के क्षेत्र में परमाणु समझौता किया गया जब कि विपक्ष और अनेक UPA के साथियों ने समझौते का विरोध किया इस समझौते के अनुसार अमेरिका भारतीय परमाणु संयंत्रों पर निगरानी रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी को निगरानी का कार्य सोंप सकता है अमेरिकन सीनेट में यह प्रस्ताव पास हो गया भारतीय संसद में परमाणु समझौता पास करवाने के लिए मनमोहन सिह ने कड़ा रुख अपना कर कुछ संशोधनों के साथ समझौता पास करवाया |आज तक इस विषय पर तीन वार्ताए हो चुकी हैं अमेरिका चाहता हैं न्यूक्लियर फ्यूल सप्लाई को उसकी निगरानी में रखा जाए तथा इसके अलावा परमाणु संयंत्रों पर भी उनकी निगरानी हो यह देश की जनता और राजनितिक दलों को मंजूर नहीं होगा |
यू .एस के सम्बन्धों को बढ़ाने में भारत का हर प्रधान मंत्री इच्छुक रहा है |मनमोहन सिह के राष्ट्रपति बुश तथा ओबामा के सम्बन्ध बहुत अच्छे थे वह यू.एस के बहुत समीप थे | मोदी की सरकार बहुमत की सरकार हैं एक बार फिर से भारत अमेरिका से अपने सम्बन्ध बढ़ाने के इच्छुक हैं पहले हम डरते थे मल्टीनेशन कम्पनिया हैं हमें नुकसान पहुचाएंगी परन्तु आज ग्लोबलाइजेशन का जमाना है |सैन्य क्षेत्र हमें अमेरिकन निवेश और टेक्नोलोजी की जरूरत है जिससे मोदी जी का मेक इन इंडिया सफल हो सके हम चीन के समकक्ष आ जाएँ और विश्व के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपना झंडा गाड़ सकें |मनमोहन सिह की सरकार के अन्तं पांच वर्ष घोटालों के नाम लिख गये इससे भारत की प्रतिष्ठा को हानि पहुची विदेशी मीडिया के ज्यादातर समाचारों में भारत की छवि खराब थी इससे भारतीय प्रवासी क्षुब्ध थे बहुमत वाली मोदी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ आई थी मोदी जी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे गुजरात का आर्थिक विकास हुआ | प्रधान मंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पहली यू.एस की यात्रा की प्रवासी भारतियों ने उनका जम कर स्वागत किया| यू.एस में मोदी जी ने अमेरिका में बसे भारतियों तथा विदेशी निवेशकों से प्रार्थना की थी वह भारत में निवेश करें भारत भी उनके लिए अपने कानूनों को सरल करेगा | ओबामा के साथ कई कम्पनियों के सीईओ भारत आ रहे हैं हमारे सीईओ उनसे मिल रहे है हमारा यू.एस से १०० बिलियन का व्यापार है ६० बिलियन के करीब निर्यात किया जाता है इसे ५०० बिलियन तक बढ़ाने का भारत का लक्ष्य है | देश में सैन्य हथियार काफी मात्रा में बाहर से ही आता है देश चाहता है इस क्षेत्र में यू.एस. निवेश करे देश सैन्य दृष्टि से समर्थ हों इसके लिए हमें आधुनिक टेक्नोलोजी भी प्राप्त हो सके और इंडो यू.एस. सैन्य सुरक्षा में एक दूसरे के सहायक बनें| (सांझा सुरक्षा )
अमेरिका में शैल गैस निकलने के बाद अब कच्चे तेल के लिए मिडिल ईस्ट की निर्भरता कम हो गई है पहले कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं अब लगातार घट रहीं है | भारत एक महाशक्ति की दिशा में कदम रख रहा है इसे बराक ओबामा नजर अंदाज नहीं कर सकते | हमें अमेरिका से सहयोग में’ उनका अनुभव भी चाहिए ‘योग्यता की भारत में कमी नहीं है | मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद का प्रश्न उठाया था बिना ओबामा का नाम लिए उन्होंने कहा था आतंकवाद अच्छा या बुरा न होकर केवल आतंकवाद ही होता है| ISIS का अभ्युदय विश्व के लिए खतरा बन गया है मिडिल ईस्ट का इस्लामी करण करने के लिए ISIS दुनिया के देशों के नोजवानों को गुमराह कर रहें है, इस्लामिक आतंकवाद से विश्व त्रस्त है| हाल ही में पैरिस में होने वाली आतंकवादी दुर्घटना ने विश्व को सचेत कर दिया है| आतंकवाद का पोषक पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है जान कैरी ने हाल ही में अपने दौरे में पाकिस्तान को चेतावनी दी है वह आतंकवादी संगठनों पर बैन लगाये स्वयं बराक ओबामा चेतावनी दे चुके हैं परन्तु पाकिस्तान को सहायता देना इस देश की अपनी नीति गत मजबूरी है | अमेरिका से पकिस्तान भी जितना पैसा बना सकता है बना चुका | अफगानिस्तान में स्थिरता के लिए उसकी मदद जरूरी है |यू.एस अफगानिस्तान से अपनी फौजें ले जाना चाहता है अमेरिकन जनता विश्व शक्ति बनना चाहती हैं परन्तु बिना अपने नागरिकों का खून भाये उन्हें भारत के सहयोग की भी जरूरत है | पाकिस्तान अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ तब तक जारी रखेगा जब तक हम एक मजबूत शक्ति नहीं बन जाते हाँ भारत को अमेरिका फिर से दो तरफा बातचीत की सलाह दे सकता है|
बराक ओबामा सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के समर्थक हैं नरेंद्र मोदी और ओबामा आपस में पहले तीन बार मिल चुके है अबकी बार उन्होंने २६ जनवरी में भाग लेने का भारतीय आमन्त्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया इससे पूर्व बुश और क्लिंटन को भी न्योता भेजा गया था परन्तु पहली बार अमेरिकन राष्टपति हमारे देश के राष्ट्रीय उत्सब में हमारी ख़ुशी में शामिल हो रहे है | यह भारत की कूटनीतिक विजय है अमेरिकन डेमोक्रेसी दुनिया की सबसे प्राचीन डेमोक्रेसी है भारत की सबसे बड़ी| ओबामा और नरेंद्र मोदी ने गरीबी को बहुत पास से देखा हैं दोनों की सोच मिलती हैं आज तक बड़े- बड़े समझौते से हमारे बीच आशाएं भी बंधी हैं लेकिन भविष्य में कई समझौते वार्ताओं में ही चलते रहे और आशायें बन कर रह गये अबकी बार देखने हैं हमें अपनी विदेश नीति में कितनी सफलता मिलती है

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अभिजात के द्वारा
January 26, 2015

बहुत ज्ञान वर्धक लेख अमेरिका और भारत के बारे में जानकारी मिली अभिजात

jlsingh के द्वारा
January 26, 2015

अब तो और भी जयादा स्पष्ट हो गया है की बराक ओबामा के भारत आने के साथ साथ रिश्ते तो बेहतर हुए ही हैं दोनों देशों को फायदा हुआ है… कूटनीतिक लाभ भी पहुंचा है … नाभिकीय उरझा की राह की सारी मुश्किलें हल हो गयी है… अर्थात फायदा ही फायदा..

Anjana Bhagi के द्वारा
January 26, 2015

देश की सबसे बड़ी डैमोक्रेसी और सबसे पुरानी डैमोक्रेसी के राष्ट्राध्यक्षों को राज पथ पर एक साथ बैठे देखा बहुत गर्व महसूस हुआ अंजना

Drashok Bharadwaj के द्वारा
January 26, 2015

देश मैं एक बहुमत की मजबूत सरकार हैं दूसरा श्री नरेंद्र मोदी की देश के प्रति इच्छा शक्ति उसका परिणाम सामने है डॉ अशोक

Shobha के द्वारा
January 26, 2015

आपने लेख पढ़ा और अभिजात जी आपको अच्छा लगा धन्यवाद डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
January 26, 2015

श्री जवाहर जी एक समय था हमारे देश को साँपों और सपेरों का देश गरीब देश कहा जाता था विश्व में अपना स्थान हमने खुद बनाया है लेख पढने का धन्यवाद डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
January 26, 2015

अंजना जी ओबामा दो घंटे ठंड और खुले आसमान में बैठे रहे यह उनकी सिम्प्लिसीटी का और भारत की बहुमत की सरकार का कमाल है डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
January 26, 2015

आप ठीक कहते है अब तक तो घोटालों से देश की छवि निंदनीय हो रही थी डॉ शोभा

pkdubey के द्वारा
January 27, 2015

मुझे आशा थी आप इस विषय पर अवश्य लिखेंगी ,पढ़कर बहुत सी नयी जानकारियां मिली आदरणीया ,सादर आभार |

Shobha के द्वारा
January 27, 2015

श्री मान दूबे जी मुझे विशवास था आप मेरा लेख पढ़ कर प्रतिक्रिया अवश्य देंगे आपको लेख पसंद आया धन्यवाद अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध और विदेश नीति मेरा बिषय रहा है डॉ शोभा

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 28, 2015

vishleshnatmak aalekh .aabhar

Shobha के द्वारा
January 28, 2015

लेख पढने के लिए बहुत धन्यवाद डॉ शोभा

rameshagarwal के द्वारा
January 31, 2015

जय श्री राम बहुत अच्छा लेख बहुत जानकारिया मिली.सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र की दोस्ती बहुत महतवपूर्ण है उम्मीद और पड़ेगी.

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 31, 2015

शोभा जी अभिवादन किन्तु ,परन्तु ,लेकिन्तु पर ही टिका है सम्बन्ध । अभी तो आगाज ही है भविष्य ही बताएगा सार्थकता ओम शांति शांति

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 31, 2015

शोभा जी अभिवादन किन्तु ,परन्तु ,लेकिन्तु पर ही टिका है सम्बन्ध । अभी तो आगाज है भविष्य ही बताएगा सार्थकता ओम शांति शांति शांति

sadguruji के द्वारा
January 31, 2015

यह भारत की कूटनीतिक विजय है अमेरिकन डेमोक्रेसी दुनिया की सबसे प्राचीन डेमोक्रेसी है भारत की सबसे बड़ी ! बहुत सही कहा है आपने ! भारत-अमेरिकी संबंधों की बहुत अच्छी और गहन जानकारी मिली ! आपने राजनयिक की तरह से बहुत अच्छा लिखा है ! मंच पर सर्वोत्तम प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
February 1, 2015

श्री रमेश जी आपने मेरा लेख पढ़ा आपको पसंद आया धन्यवाद भारत ने सही समय पर अमेरिका की तरफ दोस्ती का हाथ बढाया हैं परिणाम अच्छा ही होगा डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
February 1, 2015

श्री हरीश जी आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं भविष्य बताएगा सम्बन्ध कैसे चलेंगे वायदे पर दुनिया नहीं चलती परिणाम दिखना चाहिए डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
February 1, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी यहाँ भी कूटनीति हैं अमेरिका अफगानिस्तान से जाना चाहता हैं सीरिया में भी वह हस्ताक्षेप करना चाहता हैं सीरिया में ISISका प्रादुर्भाव हो गया है वहा लोग भूखे मर रहे हैं उसे भारत की जरूरत है आपको मेरा लेख पसंद आया धन्यवाद यही मेरा विषय रहा हैं डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
February 1, 2015

धन्यवाद हरीश जी यहाँ व्यंग के लिए आपके पास कुछ नहीं था शोभा

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
February 2, 2015

शोभा जी , भारत-अमरीका संबधों पर बहुत अच्छा जानकारीपूर्ण लेख । वैसे आतंकवाद के मामले मे अमरीका के दोहरे मापदंड हैं । वह अपने हित ज्यादा देखता है । पाकिस्तान को डालर भी देता है और भारत को भरोसा भी कि वह भारत के साथ है ।

Shobha के द्वारा
February 3, 2015

अमेरिका की भी मजबूती है उसे अफगानिस्तान में पाकिस्तान की जरूरत थी उसी का पाकिस्तान नें फायदा उठाया जैसे ही ओबामा की विदेश नीति में जरा सा परिवर्तन हुआ पाकिस्तान चीन की और भागा सब राजनीति है लेख पढने का धन्यवाद डॉ शोभा


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