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परदेस में ईद मुबारक

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परदेस में ईद मुबारक ईद का अर्थ है ख़ुशी अर्थात खुशियों का पर्व | जब भी ईद आती है मेरी स्मृति में कुछ यादें उभर जाती हैं| हम कई वर्ष परिवार सहित ईरान में रहे हैं यहाँ की अधिकाँश आबादी शिया है| हम ईरान के खुर्दिस्तान में रहते थे यहाँ सुन्नी मुस्लिम का बाहुल्य था | तीस दिन तक रमजान के महीने में रोजे रखने के बाद ईद आती हैं जिस धूम धाम से हमारे यहां ईद मनाई जाती है वैसे मैने वहाँ नहीं देखा | हमारे यहां कई दिनों पहले बाजार सज जाते हैं नए नए डिजाईनर कपड़े खूबसूरत जूते चप्पलें असली और नकली डिजाईनर जेवर मन को मोह लेते हैं |हर मुस्लिम अपनी हैसियत से बढ़ कर खर्च करते हैं | तरह – तरह की मिठाईयाँ भुनी बारीक सेवइयां हरेक का ध्यान खींचती हैं |ख़ास कर रमजान के दिनों में रात को लगने वाले खाने के बाजार यहाँ क्या नहीं बिकता खाने की महक दूर- दूर तक फैली रहती हैं |शौकीन लोग खाने का लुत्फ़ उठाते हैं ख़ास कर मांसाहार के शौकीनों के लियें नायाब किस्म –किस्म के गोश्त की वैराईटी बिकती हैं | रमजान ईद के चाँद के साथ खत्म होते हैं और फिर आता है ईद का दिन |नये-नये कपड़ों में सजे लोग एक दूसरे को ईद मुबारक कहते हैं और हमारे घरों में भी इंतजार होता हैं ईद की लजीज सेवईयों का जो बड़े प्यार से बनाई जाती हैं और हर मिलने वालों के घरों में भेजी जाती हैं |
– शाम को कहीं – कहीं कव्वालियों के प्रोग्राम होते हैं और ,हर सिनेमा घर में नई फिल्म लगती है | ईरान में रमजान के दिनों में लगभग सभी रोजे रखते थे सिवाय बिमार को छोड़ कर रोजे दारों के ओंठ सूख जाते थे चेहरे पर रोजे का साफ़ असर नजर आता था | ईद के दिन ईद की मुबारक बाद दी जाती थी| अच्छा गोश्त पकता था शीरींन और केक भी लाया जाता है पर सेवइयां नदारद थी |हम लोगों के लिए ईद का मतलब टेलीविजन पर मजेदार प्रोग्राम और पूरी एक कार्टून फिल्म दिखाई जाती थी जिसे बच्चे क्या बड़े भी बड़े भी शौक से देखते थे शाम को कभी – कभी हिंदी में डब की फिल्म भी दिखाते थे|
ईद की सुबह मेरे पति के प्रिय पठान दोस्त डॉ हुनरगुल ने हमें ईद के मौके पर अपने घर बुलाया | हुनर गुल हम सबको खुदा हाफिज कह कर अपने शहर पेशावर पाकिस्तान लौट गये थे वहाँ उनकी सरकारी नौकरी भी थी | अब दुबारा उनसे मिल पायेंगे ऐसी उम्मीद नहीं थी |ईद के दिन लोग अपने घर जाते हैं वह लौट कर फिर परदेस कुछ माह और नौकरी करने के लिए वापिस आ गये | पाकिस्तान के सभी डाक्टर परिवार मिल कर ईद मनाते थे हम उस एरिया के अकेले नार्थ इंडियन (उत्तरभारतीय) थे | पकिस्तान के पंजाब प्रांत के निवासी ,पठानों और कराची निवासी सिन्धी और मुहाज्रर( भारत से गये मुस्लिम समुदाय ) आपस में मिलजुल कर रहते हैं यदि भारतीय पंजाब प्रांत का परिवार हैं ,पंजाबी पाकिस्तानी उनसे इतने घुलमिल कर भाई या बहन का रिश्ता गाँठ लेते थे | हम मथुरा वासी उन्हें दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा पर बुलाते थे मैं भगवान के भोग के लिए बहुत कुछ बनाती थी बिना प्याज का विशुद्ध शाकाहारी भोजन जिसमें सबसे अधिक दूध दही के पदार्थ होते थे क्योंकि बाल गोपाल कन्हैया को यह बहुत भाते हैं | वह भगवान कृष्ण को लौर्ड कृष्णा गीता को अल्लाह की जुबान कहते थे | मीठी ईद के दिन सब अपने घर से कुछ न कुछ बना कर लाते थे | मैं ज्यादातर खीर बना कर ले जाती थी | ईद के दिन मिल कर खाना खाते थे और फिर बातों का क्रम चलता था उसमें ज्यादातर वह अपने परिवार के साथ मनाई गई ईद या ईद से सम्बन्धित संसमरण सुनाते थे |
डॉ हुनरगुल और उनकी पत्नी सूफिया इस ईद पर बहुत भावुक थे डाक्टर साहब ख़ास कर डॉ हुनर गुल| उनके पिता नौर्थ वेस्ट फ्रंटियर में गरीब किसान थे उनके आठ बेटे और एक बेटी थी बड़ी गरीबी से दिन गुजरते थे |उन भाई बहनों को ईद के दिन कपड़ों में कमीज मिल जाये बहुत बड़ी बात थी छोटे बच्चों को सलवार भी नसीब नही हो पाती थी सलवार पुरानी फटी ही पहननी पडती थी या वह भी नहीं | कुछ बड़ा होने पर ईद के लिए वह सब छोटा मोटा काम कर थोड़े से पैसे जमा कर तब जाकर मेला देखने जाते थे परन्तु पैसे इतने कम होते थे कुछ भी खरीद नहीं सकते थे | उनके बड़े भाई को वहाँ के सरकारी अस्पताल में कम्पाउंडर की नौकरी मिल गई उसकी तनखा से घर चलता था वह घर-घर जा कर सुई पट्टी जैसे कुछ काम कर लेते थे जिसके बदले में लोग सौगात में अंडे या मुर्गी देते थे |हुनरगुल और उनसे दूसरे नम्बर का भाई पढने में बहुत अच्छे थे | इनका एडमीशन डाक्टरी में हो गया छोटे भाई का इंजीनियरिंग में लेकिन एडमिशन के पैसे नहीं थे अत: वह फ़ीस जमा करने के लिए कराची बन्दरगाह पर मजदूरी करने के लिए गये जहाँ वह लोडर का काम कर इतने पैसे ला सके जिससे एडमिशन हो सके लेकिन आगे का खर्चा उनका बड़ा भाई उठाने को तैयार था |इसके लिए भी वह बहुत मेहनत करते थे रात रात दूर दराज गावों में सुई पट्टी करने जाता थे लम्बे काम करने पर जैसे आपरेशन के बाद की पट्टियाँ ,खाते पीते लोग उन्हें साल छमाही दुम्बा दे देते थे उसे भी बेच कर वह भाईयों की किताबों का खर्चा उठाते थे | उन्होंने बताया हम ईद पर कभी घर नहीं जा पाये |बचपन में भी लगभग आधी अधूरी ईद होती थी इतनी गरीबी ऊपर से इतने बच्चे |हर छुट्टी में उन्हें आगे की पढाई चलाने के लिए कराची बन्दरगाह मजदूरी करने जाना पड़ता था | मैने कहा आप ट्यूशन कर खर्चा उठा सकते थे उन्होंने कहा हम अफरीदी पठान हैं हमारी कौम जाहिलों से भरी हैं उन्हें अपने एरिया में विकास भी नहीं चाहिए न बिजली न सड़क पढ़ने का सवाल ही नहीं बहुत कम लोगों के बच्चे पढ़ते थे ज्यादतर लोग अफीम की खेती करते हैं अत: वह सेना या पुलिस को उधर जाने नहीं देते | यदि लड़ाई हो जाए एक दूसरे पर बंदूके तान देते हैं “ मुझ पर कहूँ सवार है या तू मुझे मार दे नहीं तो मैं तुझे मार दूंगा |” शिक्षा ने मुझे समझदार और बुजदिल बना दिया बना दिया | इस कष्ट से उनकी पढाई पूरी हुई| भाई की इंजीनियरिग पहले खत्म हुई उसे सरकारी नौकरी मिल गई समझ लीजिये होश में पहली ईद थी जो बड़ी धूमधाम से मनाई गई परन्तु अभी ईदी देने की हैसियत नहीं थी | जब मेरी नौकरी लगी अम्मी जान ने सबको ईदी दी उस दिन अम्मी सारा दिन अल्लाह का शुक्र अदा कर रोटी रही अब्बा पहले ही फौत कर गये थे | हम सबकी आँखों में पानी आ गया |हुनर गुल जिस परिवार में ज्यादा बच्चे देखते थे दुखी हो जाते थे |
और सुफिया मेरी प्यारी सहेली उसकी एक ही इच्छा थी एक ऐसा बेड़े ( आंगन) वाला घर जिसमें एक तरफ भाभी रहती हो दूसरी तरफ वह ,दिन भर अपने अपने छज्जे पर बैठ कर गप्पें मारें | उसके पिता और डॉ हुनरगुल के पिता दोनों बचपन के दोस्त थे वह फौज में भरती हो गये लेकिन हुनरगुल के अब्बा ने गाँव नहीं छोड़ा लेकिन अपनी दोस्ती को और मजबूत करने के लिए सूफिया और हुनर गुल को बचपन मे नाम जद ( रिश्ता पक्का ) कर दिया जब नन्हें हुनर गुल ने स्कूल जाना शुरू ही किया था उनके तन पर कमीज थी सलवार के पैसे अब्बा के पास नहीं थे | सुफिया दो भाई बहन थे उसके बड़े भाई पाकिस्तान आर्मी में कर्नल थे वह काफी समय तक सऊदिया की मिलिट्री सर्विस में रहे और सूफिया एक टीचर थी | मैंने एक दिन सूफिया से पूछा यदि हुनरगुल डाक्टर नहीं होते तो क्या आपकी शादी होती? सुफिया ने बताया न करने पर इतना खूनखराबा होता आप सोच नहीं सकती पठान अपनी जुबान से नहीं फिर सकते | सुफिया की अच्छी तकदीर ,बहुत ही शानदार जोड़ा था दोनों लम्बे छरहरे, जहीन थे | डॉ हुनरगुल ने बताया सूफिया के काबिल बनने के लिए कराची के बन्दरगाह में बोझा ढोया हैं |
जब वह फिर से पाकिस्तान जा रहे थे हमारे एरिया में जम कर बर्फ पड़ रही थी सूफिया ने अपने शौहर से कहा हुनर गुल तुमसे जीवन में कुछ नहीं मांगूगी बस ईरान को गुडबाय करते समय भाभी और डाक्टर साहब से मिला दो| हुनर गुल मजबूत गाड़ी के पहियों में जंजीर लपेट कर सुफिया को मुझसे मिलाने लाये | रात भर रह कर जब वह लौटे सुफिया ने कहा मेरी कब्र में सोयी रूह भी आपको याद करेगी |गाड़ी धीरे धीरे बर्फीली पहाड़ी पर चढ़ती रही हम परिवार सहित उनको जाते देखते रहे बच्चे अपने चाचा चाची के लिए रो रहे थे | हमारे अपने लगने वाले दुश्मन देश के बाशिंदे , उनके और हमारे बीच में लम्बी सरहद है जहाँ गोलियाँ और गोले चलते रहते हैं सरहद की हिफाजत के लिए जान हथेली पर रख कर सैनिक तत्पर रहते हैं | हजारों आतंकी हमारी सीमा में घुसने के लिए तैयार खड़े हैं |कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया गया हैं| पाकिस्तानी हकूमत ,आर्मी वहाँ का नेतृत्व और हाफिज सईद जैसे सिरफिरे रोज धमकियाँ देते रहते हैं हिन्दुस्तान जैसे विशाल परमाणु शक्ति से सम्पन्न देश को अपनी परमाणु शक्ति होने का भय दिखाया जाता है| अब हमसे सब कितने दूर हैं |

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
July 18, 2015

SAHEE KAHA AADARNIYA SHOBHA JEE ANTIM PANKTIYON NE HRIDAY CHHOO LIYA JAANE KYOON SARHAD PAR PAKISTAAN APNEE NAPAK HARKATON SE BAAZ NAHEE AATA HAI

Shobha के द्वारा
July 18, 2015

श्री दीपक जी पता कैसे आपने अपनी प्रतिक्रिया पहुंचा दी मेरे समझ में ही नहीं आता कोशिश कर हार चुकी हूँ आपने लेख पढ़ा धन्यवाद पाकिस्तान का जन्म ही भारत के विरोध से हुआ हैं उसकी नापाक हरकतें कभी खत्म नहीं होंगी

sadguruji के द्वारा
July 18, 2015

aadarniyaa doctor shobhaa bhaardwaaj ji ! saadar abhinandan ! bahut achche sansmaran ke liye hardik badhai ! sabki iid mubarak ho !

sadguruji के द्वारा
July 18, 2015

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत अच्छे संस्मरण के लिए हार्दिक बधाई ! डॉ हुनरगुल और सूफिया जी सहित सबको ईद मुबारक हो ! कुछ टाइप करना और कमेंट भेजना इस मंच पर पहाड़ हो गया है ! आपतक पहुंचे तो ईश्वर को लाख लाख धन्यवाद !

rameshagarwal के द्वारा
July 19, 2015

जय श्री राम शोभा की अपने बहुत अच्छा लेख लिखा हमने भी २१ साल तक नाइजीरिया में क्रिसमस और ईद का आनंद लिया .नाइजीरिया में ७० ज्ञ मुस्लिम्स और ३०% क्रिसियन थे मुस्लिम्स बहुत अच्छे थे परन्तु १९७१ में बेन्गादेश की वर से कुछ नाराज़ थे.ईद के दिनों में कई जगह मुसलमान एक दुसरे को मार रहे क्या यही इस्लाम है अपने बॉर्डर में भी गोलिया चल रही?लेख के लिए साधुवाद.२ दिन हम भी बगदाद घूमे थे.

rameshagarwal के द्वारा
July 19, 2015

जय श्री राम शोभा की अपने बहुत अच्छा लेख लिखा हमने भी २१ साल तक नाइजीरिया में क्रिसमस और ईद का आनंद लिया .नाइजीरिया में ७०  मुस्लिम्स और ३०% क्रिसियन थे मुस्लिम्स बहुत अच्छे थे परन्तु १९७१ में बांग्लादेश के युद्ध से कुछ नाराज़ थे.ईद के दिनों में कई जगह मुसलमान एक दुसरे को मार रहे क्या यही इस्लाम है अपने बॉर्डर में भी गोलिया चल रही?लेख के लिए साधुवाद.२ दिन हम भी बगदाद घूमे थे.

brijeshprasad के द्वारा
July 19, 2015

आदरणीय शोभा जी, सदारप्रणाम। काफी समय बाद ब्लॉग पर आ सका। आप के लेख पड़ने की ललक में लगभग पूरा ब्लॉग ही खोज डाला तब आप का यह लेख मिला। ब्लॉग की लोगो ने क्या दूरदश कर दी है। हमेशा की तरह लेख में ऐसा प्रवाह था, की उस प्रवाह में बहता ही चला गया। सुन्दर लेखन के लिए आभार। धन्यवाद।

Shobha के द्वारा
July 22, 2015

श्री रमेश जी आपने लेख पढ़ा धन्यवाद हमारे देश और पड़ोसी देश में अलग तरह का व्यवहार हैं वहाँ के लोग बहुत जल्दी घुल मिल जाते थे मेहमान समझते थे प्रवास से बहुत बातें समझ में आती हैं |

Shobha के द्वारा
July 22, 2015

रमेश जी आज कल एक दुसरे के प्रति नफरत का भाव बढ़ता जा रहा है कट्टरपंथी पुरे विश्व को एक धर्म में दीक्षित करना चाहते हैं पढ़े लिखे इससे बहुत कुंद हैं

Shobha के द्वारा
July 22, 2015

आदरणीय ब्रिजेश जी आपका लेख मैने बहुत देर बाद देखा मैने पढने के बाद उस पर प्रतिक्रिया दी परन्तु पहुंची नहीं आज कल लेख भी कम दिखाई देते हैं उस स्थान पर ऐड दिखाई देते हैं आपने पता नहीं कैसे अपने विचार पहुँचाये में कम्प्यूटर का काम च्लाऊ ज्ञान रखती हूँ आपका लेख बहुत अच्छा था पहले की तरह था आपने मेरा लेख पढ़ा आपको पसंद आया धन्यवाद

ashasahay के द्वारा
July 23, 2015

शोभा जी, व्यस्तता के कारण  आज देख पायी । संस्मरण ने हमें भी पुराने माहौल की याद दिला दी। प्रभावशाली  और प्रेरक लेख । आशा सहाय –।

Shobha के द्वारा
July 24, 2015

प्रिय आदरणीय आशा जी आपने लेख पढ़ा धन्यवाद जागरण में अपने पसंद के लेखों को प्रतिक्रिया भेजना बहुत मुश्किल हो गया है मैं जो भी प्रतिक्रिया भेजती हूँ पहुँच नहीं पाती अत :मैने एक लेख लिखा है मुझे कुछ कहना है यह सभी की समस्या है आपकी प्रतिक्रिया कैसे पहुँच गई पता नहीं

jlsingh के द्वारा
July 27, 2015

आदरणीया डॉ. शोभा जी, सादर अभिवादन! अब मैं अपनी कहानी बताता हूँ. आपको पता होगा, जमशेदपुर में दो सम्रदायों के बीच तनाव का माहौल पैदा हो गया था. इसे पैंदा किया था कुछ पियक्कड़ नौजवानों ने! एक ही समुदाय के ये शोहदे ईद के दूसरे दिन मैदान में बैठकर शराब पी ..आपस में मार-पीट, गाली-गलौज किया. और उन्ही में से एक पक्ष ने मुस्लिम समुदाय को भड़काया और दूसरे ने हिन्दू समाज को हवा दी. बस जमशेदपुर में तनाव उत्पन्न हो गया तीन दिन तक जमशेदपुर में कर्फ्यू लगा रहा. कुछ दुकानें जलीं और हमेशा गुलजार रहनेवाला प्यारा सा शहर संगीनों के शाये में रहा. अब स्थति में सुधार है. मेरा पड़ोसी मुसलमान है वह मुझे बतलाकर मुस्लिम बहुल इलाके में अपनी सुरक्षा हेतु तीन दिन अपने रिश्तेदार के घर रहा. एक दिन उसकी पत्नी मेरे घर में काफी देर रही…. इसी ऊहा पोह में मैंने अपने प्रिय मुसलमान मित्र को फोन से भी ईद मुबारक नहीं बोल सका. आज उसी मित्र का लड़का मेरे घर में ईद मुबारक बोलने आया और बैठकर काफी बातें की. तात्पर्य यही है कि हम लोग स्वभाव से सहृदय और सर्वधर्म समभाव रखनेवाले हैं पर बीच बीच में कुछ बदमाश लोग माहौल ख़राब कर देते हैं और हम सभी अफवाहों के शिकार हो जाते हैं… बस …सादर!

Shobha के द्वारा
July 29, 2015

श्री ज्वाहर जी हम सब इन्सान हैं एक दूसरे के साथ प्यार से रहते है बस अराजक तत्व परेशानी पैदा करते हैं मेरे पीटीआई डाक्टर हैं उनके पास इलाज लेने मुस्लिम परिवार नियमित रूप से आते हैं अपने दुःख सुख में इनको सांझीदार बनाते हैं हमारी भर के पीछे एक मुस्लिम परिवार रहता हैं उस घर के मुखिया की मृत्यु हो गई बच्चे ज्यादा बड़े नहीं थे मुझसे उस मौत का दुःख सहा नहीं जा रहा थी में उनके घर में ऐसे रो रही थी जैसे अपने नजदीकी हों सारा झगड़ा पैदा किया जाता हैं आपने लेख पढ़ा अपना अनुभव बनता बहुत अच्छा लगा


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