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1965 भारत पकिस्तान युद्ध भारतीय नेतृत्व और सेना की गौरव गाथा

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1965 भारत पाकिस्तान युद्ध भारतीय नेतृत्व और सेना की गौरव गाथा
भारत और पकिस्तान के बीच हुये 1965 के युद्ध को 50 वर्ष बीत चुके हैं | एक सितम्बर 1965 के बाद भारतीय सेना ने लाहौर और सियालकोट का बार्डर खोल कर वह कर दिखाया जिसकी पकिस्तान कल्पना भी नहीं कर सकता था |पाकिस्तानी विदेश मंत्री भुट्टो और पाकिस्तानी प्रेसिडेंट पूरी तरह आश्वस्त थे भारत में हिम्मत नहीं है वह कश्मीर को बचा सकेंगे| लेकिन हमारी सेनायें लाहौर से कुल 16 किलोमीटर की दूरी पर खड़ी थी लाहौर शहर में प्रवेश करने में समर्थ लाहौर शहर भारतीय तोपों की जद में था | शहर वासियों का भी बुरा हाल था न जाने कब भारतीय सेना शहर में प्रवेश कर जाए और वह अपने घर द्वार छोड़ने पर विवश हो जायें |
युद्ध की कहानी 5 अगस्त 1965 से शुरू होती है पकिस्तान की 33 हजार मुजाहिदीनों के वेश में सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया | पकिस्तान ने देखा था 1962 के भारत चीन युद्ध में भारत चीन के साथ मुकाबला नही कर सका था भारत की स्थिति कमजोर थी |दूसरी तरफ पकिस्तान ने एंग्लो अमेरिकन ब्लाक के साथ पैक्ट कर सीटो (SEATO)और बगदाद पैक्ट का मेंबर बन गया उसे कम्युनिज्म से लड़ने के लिए आधुनिक हथियारों की सप्लाई होने लगी जबकि उसे चीन या रूस से कोई खतरा नहीं था | पकिस्तान ने अपनी विदेश नीति में बदलाव कर चीन से नजदीकियां बधाई | पाकिस्तानी सैनिकों को पकिस्तान द्वारा कब्जा किये गये कश्मीर में चीन द्वारा दो वर्ष तक गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिग दी गई |पकिस्तान को कम्युनिज्म के खिलाफ सैनिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए अमेरिका ने पेटेंट टैंक की बड़ी खेप भेजी थी | यह टैंक अजेय माने जाते थे जबकि भारत के पास द्वितीय युद्ध में इस्तेमाल होने वाले टैंक थे यही नहीं उसकी वायु सेना को भी मजबूत कर, पकिस्तान का हौसला बढ़ा दिया | पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष को विश्वास था जैसे ही कश्मीर में वह गुरिल्ला युद्ध शुरू करेंगे कश्मीरी नौजवान उनके साथ मिल जायेंगे उसकी कश्मीर को हासिल करने की इच्छा पूरी हो जाएगी |कश्मीर वह चुटकियों में हासिल कर लेंगे |
पकिस्तान ने भारत के खिलाफ युद्ध की शुरुआत मार्च 1965 के महीने में कच्छ की रण से की गई यह झड़पें सीमा सुरक्षा दलों में हो रही थी बाद में दोनों देशों की सेना में भी झड़पें होने लगी | एक जून को ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री विल्सन ने बीच बचाव कर लड़ाई रुकवा कर यह मामला मध्यस्थता के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को सौंप दिया जिसके निर्णय में हमें कच्छ का 900 वर्ग मील का प्रदेश पाकिस्तान को देना पड़ा जबकि पाकिस्तान 3500 वर्गमील पर दावा कर रहा था भारत में इस फैसले का बहुत विरोध हुआ लेकिन सरकार इस फैसले को मानने के लिए बचन बद्ध थी|

।पकिस्तान का हौसला बहुत बढ़ चुका था उनके विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो बहुत उत्साहित थे उन्हें यह अवसर उपयुक्त जान पड़ा क्योंकि चीन के युद्ध से भारत को काफी नुकसान उठाना पड़ा था |पांच अगस्त 1965 को पकिस्तान की सेना ने कबायलियों के वेश में कश्मीर में प्रवेश किया |स्थानीय आबादी ने यह सूचना पर तुरंत भारतीय सेना को दी |बिना देर किये सेना ने जबाबी कार्यवाही शुरू कर दी | |एक तरफ पाकिस्तानी सेना के विरुद्ध जबाबी कार्यवाही की , पाकिस्तान द्वारा कब्जा की गई तीन पहाड़ियों को आजाद करा लिया |अब पकिस्तान ने और भी जोर शोर से आपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया | पकिस्तान ने उड़ी और पुंज पर कब्जा कर लिया लेकिन भारतीय सेना ने भी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर कर पकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर में आठ किलोमीटर घुस कर हाजी पीर दर्रे पर अपना झंडा लहरा दिया |भारतीय सेना अब उस मार्ग को भी समझ गई जहाँ से घुसपैठिये आ रहे थे पकिस्तानी जरनल परेशान हो गये कहीं भारत मुजफ्फराबाद पर कब्जा न कर लें अत : उन्होंने आपरेशन ग्रैंड स्लेम शुरू किया |
ग्रैंड स्लेम अभियान –इस अभियान के दौरान पाकिस्तानी सेना ने अखनूर और जम्मू पर हमला कर दिया यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थे अखनूर की भौगोलिक स्थित ऐसी थी, पकिस्तान का कब्जा होते ही कश्मीर देश से अलग हो जाता यह चिंता का विषय था लेकिन पाकिस्तान से एक चूक हो गई उसने ऐसे मौके पर सैनिक कमांडर बदल दिया जिससे पाकिस्तानी सेना कुछ समय के लिए भ्रमित हो गई भारत को मौका मिल गया उसने अपनी स्थिति मजबूत कर ली अब तक थल सेना ने ही युद्ध में भाग लिया था अब वायु सेना ने हवाई हमले शुरू किये | पाकिस्तान ने भी श्रीनगर और पंजाब पर जबर्दस्त हवाई हमले किये |एक सितम्बर को पाकिस्तानी सेना ने चम्ब डोरिया सेक्टर पर हमला बोल दिया और 5 सितम्बर को पाकिस्तानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय बाउंड्री पार कर बाघा पर जो अमृतसर के पास है हमला किया भारत ने भी जबाबी कार्यवाही में 6 सितम्बर को इचछोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पकिस्तान के बड़े हमले का मुकाबला किया |यह नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी यहाँ सफलता न मिलने पर भारतीय सेना ने बरकी गाँव के करीब नहर को पार कर लिया |
भारत के कुशल नेतृत्व में देश के प्रधानमन्त्री और सेना अध्यक्षों ने महत्व पूर्ण निर्णय लिया सितम्बर को लाहौर और स्यालकोट का मोर्चा खोल दिया अब भारतीय सेना लाहौर से केवल 16 किलोमीटर की दूरी पर थी मजबूरी में अमेरिका के कहने के लिए कुछ समय के लिए युद्ध रोकना पड़ा क्योंकि अमेरिका अपने नागरिकों को विमान द्वारा लाहौर से सुरक्षित निकालना चाहता था | पकिस्तान ने भी अवसर का लाभ उठाया लाहौर का दबाब कम करने के लिए खेमकरण पर हमला कर उस पर कब्जा जमा लिया | भारत ने भी बेदिया और उसके आसपास के गांवों पर हमला बोल दिया | लड़ाई की रफ्तार कुछ थमने लगी दोनों देश अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने लगे |ब्रिटिश प्रधानमन्त्री पकिस्तान की कार्यवाही पर अब तक चुप थे जैसे ही पंजाब के मोर्चे पर भारतीय सेना ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तानी क्षेत्रों पर कब्जा करना शुरू किया ब्रिटिश प्रधानमन्त्री हरकत में आ गये |अमेरिकन सेक्रेटरी आफ स्टेट ने घोषणा की भारत और पाकिस्तान दोनों को किसी किस्म की सैनिक मदद नहीं दी जायेगी | विश्व का कोई भी देश पाकिस्तान के पक्ष में नहीं बोला केवल 7 सितम्बर को चीन पकिस्तान के पक्ष में खुल कर बोला उसने भारत को चेतावनी देते हुए भारत चीन सीमा पर युद्ध छेड़ने की धमकी दी |पकिस्तान को युद्ध में काम आने वाले सामान ,बम वर्षक विमान और टैंक भी दिए |
संकट की घड़ी में शास्त्री जी बिलकुल विचलित नहीं हुए उन्होंने इस मोर्चे को भी सम्भालने की हिम्मत दिखाई | सोवियत प्रधानमन्त्री ने भारत और पकिस्तान दोनों से युद्ध विराम और दोनों देशों के झगड़े में मध्यस्थता की अपील की लेकिन इस युद्ध में अमेरिका और सोवियत रशिया दोनों शक्तियाँ तटस्थ रहीं | संयुक्त राष्ट्र सेक्रेटरी जरनल यूथांट ने भारत और पाकिस्तान से युद्ध विराम करने की घोषणा की| कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षक निम्बो की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर पर बिना मिलिट्री यूनिफार्म के हमला किया गया था जिसका भारतीय सेना ने विरोध किया हैं शुरुआत पाकिस्तान की और से की गई हैं |पकिस्तान को भारत की समर्थता का अनुमान नहीं था वह विदेशी हथियारों के बल पर उछल रहा था | युद्ध में हथियारों से अधिक मनोबल लड़ता है | 22 23 सितम्बर को युद्ध विराम हुआ |
इस युद्ध में दोनों देशों ने बहुत कुछ खोया पाकिस्तान के 3800 सैनिक मारे गये भारतीय सेना के 3000 शहीद हुए | भारतीय सेना ने स्यालकोट और लाहौर तक दस्तक दे दी कश्मीर की उपजाऊ जमीन पर कब्जा कर लिया दोनों देश संयुक्त राष्ट्र की पहल पर युद्ध विराम पर राजी हुये |रूस के प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप दोनों देश ताशकंद में मिले एक तरफ लम्बे चौड़े अय्यूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति एवं सेनाध्यक्ष दूसरी तरफ दुवले पतले छोटे कद के नम्र लेकिन आत्मविश्वास से पूर्ण लालबहादुर शास्त्री जी के बीच 11 जनवरी सन 1966 के दिन समझौता हुआ दोनों द्वारा घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किये गये 25 फरवरी तक दोनों देश नियन्त्रण रेखा तक अपनी फौजें हटा लेंगे जीती हुई जमीन छोड़ कर पहले की स्थिति में आ जायेंगे |आपसी झगड़ों का निपटारा शांति वार्ता से करेंगे | कुछ ही घंटों के बाद शास्त्री जी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई | मौत एक रहस्य बन कर रह गई |देश ने मजबूत इरादों वाले कुशल नेतृत्व में समर्थ नेता खोया | देश इस समझौते से खुश नहीं था |
भारत और पकिस्तान के बीच 1971 में युद्ध हुआ |पाकिस्तान ने अपने आप को भारत के खिलाफ असमर्थ पा कर छद्म युद्ध ( आतंकवाद ) का सहारा लिया |करगिल का भी युद्ध हुआ लेकिन कभी शांति नही हो सकी |दोनों देश परमाणु शक्ति सम्पन्न देश हैं | पकिस्तान न शांति से जीता है न भारत को भी शांति से विकास की राह पर चलने देता है |इस देश को चार शक्तियां चलाती है पकिस्तान की जनता द्वारा चुनी सरकार है, सेना ,आईएसआई और हाफिज सईद जैसे दबाब समूह जिनकी रूचि देश कल्याण की अपेक्षा जेहाद में अधिक है देश की नोजवान पीढ़ी को भारत के खिलाफ भड़का कर आतंकवाद के रास्ते पर ले जाना उनका उद्देश्य रहा है |

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
September 3, 2015

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत अच्छा लेख ! बहुत विस्तृत जानकारी आपने दी है ! आपने सही कहा है कि पकिस्तान न शांति से जीता है न भारत को भी शांति से विकास की राह पर चलने देता है ! सादर आभार !

rameshagarwal के द्वारा
September 4, 2015

जय श्री राम शोभा जी बहुत अच्छा और विस्तृत लेख के लिए बधाई पाकिस्तान कभी नहीं सुधरेगा लेकिन मोदीजी के होने से देश सुरक्षित है पाकिस्तान भी जानता है लेकिन आदत से मजबूर क्योंकि वहां की राजनीती भारत विरोधी और सेना ई एस ई के हाथो में है.हमारी सेना युद्ध के लिए तैयार है.

pkdubey के द्वारा
September 4, 2015

सादर आभार आदरणीया ,इतिहास की कठिनाई को सुगमता से बताने के लिए ,अवश्य ही देश को ऐसे ही इतिहासकार चाहिए , आप द्वारा लिखित इतिहास ऐसा लगता ,जैसे दादी-नानी की कहानी हो | हम सरल और सीधे हैं ,पर वेवकूफ नहीं | आप के ब्लॉग को पढ़कर मुझे याद आया गीता का मंत्र -” यत्र योगेश्वरो कृष्णा ,यत्र पार्थो धनुर्धरः ………………… पाकिस्तान को हमारी तरक्की नहीं सुहाती ,पर इस बार युद्ध हुआ तो लाखो -करोडो मरेंगे |

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 4, 2015

आपके आलेख से १९६५ के भारत -पाकिस्तान युद्ध के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई ,बुरी सोच के बुरे नतीजे होते हैं पाकिस्तान खुद भी उतना विकास नहीं कर पा रहा है जितना भारत ने किया है .

jlsingh के द्वारा
September 6, 2015

आदरणीया डॉ. शोभा भारद्वाज जी, सादर नमन! आपका कोई भी आलेख सरलता से हृदयंगम हो जाता है. श्री पी के दुबे ने ठीक ही कहा है आप बड़ी सरलता से इतिहास पढ़ा देते हैं. और आपकी अंतिम पंक्तियाँ – पकिस्तान न शांति से जीता है न भारत को भी शांति से विकास की राह पर चलने देता है |इस देश को चार शक्तियां चलाती है पकिस्तान की जनता द्वारा चुनी सरकार है, सेना ,आईएसआई और हाफिज सईद जैसे दबाब समूह जिनकी रूचि देश कल्याण की अपेक्षा जेहाद में अधिक है देश की नोजवान पीढ़ी को भारत के खिलाफ भड़का कर आतंकवाद के रास्ते पर ले जाना उनका उद्देश्य रहा है |- मनन करने योग्य है, आखिर पाकिस्तान को इन सब से क्या मिलता है? पाकिस्तान के नेता आखिर किस स्कूल से पढ़कर दहशतगर्दी में जीने को मजबूर हैं? इतिहास मेरे लिए बहुत रुचिकर विषय नहीं रहा है पर आपकी शैली में रोचकता के साथ जानकारी अधिक मिलती है. सादर!

ashasahay के द्वारा
September 7, 2015

आदरणीया शोभा जी ,जानकारी सेभरे इस लेख के लिए बहुत धन्यवाद । ऐसे लेखों की आवश्यकता होती है।भूला प्रसंग सिलसिला से याद आ जाता है।लेख पढ़ने में थोड़ा विलम्ब अवश्य हो गया, ।—आशा  सहााय

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 8, 2015

शोभा जी, अभिवादन । 65 युध्द पर अच्छा विस्तृत लेख है , जानकारीपूर्ण । पढ कर पुरानी बाते याद आ गईं। उस समय मेरी उम्र लगभग 7-8 साल थी । वैसे थोडा बहुत याद है क्योंकि तब हम छावनी क्षेत्र मे रहा करते थे।

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आपने मेरा लेख पढ़ा धन्यवाद पाकिस्तान का जन्म ही केवल भारत से लड़ने के लिए हुआ है वह अपना काम बखूबी से निभा रहा है अंग्रेजों की कृति का नाम पाकिस्तान है

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

श्री रमेश जी आप नियमित रूप से मेरा लेख पढ़ते हैं मेरा उत्साह अपनी प्रतिक्रिया द्वारा बढाते है धन्यवाद पकिस्तान ब्रिटिश राज की नीति का परिणाम है फूट डालो राज करो वह जहाँ से भी गये हैं झगड़े का बीज बों गये हैं अब खुद ही कमजोर हो चुके हैं |

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

श्री दूबे जी बचपन में रो -रो कर इतिहास पढ़ती और रटती थी बाद में मेरी समझ में आया यह तो पुराने समय में घटित घटनाओं को क्रम वार दिया गया है आप ने ठीक लिखा है पाकिस्तान हमारी तरक्की से जलता है |युद्ध में हमारा नुकसान नहीं है हम तो पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानते हैं मर कर फिर किसी न किसी रूप में पैदा हो जायेंगे परन्तु पाकिस्तान के बाशिंदों को आखिरात का इंतजार करना पड़ेगा | लेख पढने का बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

प्रिय निर्मला जी पाकिस्तान का विशवास हैं हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे पाकिस्तान के पढ़े लिखे लोग प्रश्न करते हैं हम क्यों भारत से पिछड़ गये वह उनको चुप करा देता है चुप पहले कश्मीर फिर कुछ और |निर्मला जी लेख पढने का बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

श्री जवाहर जी वह जेहादी पाठशाला का विद्यार्थी है जिस तरह पूर्वी पकिस्तान बंगला देश बना है वह भी चाहता है वह इस बात का बदला ले इसीलिए भारत से उसका छद्म युद्ध चलता रहता है इतिहास को हमारे यहा रटाया जाता रहा है मैं भी रो रो कर रटती थी लेख पढने का बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

प्रिय आदरणीय आशा जी मुझे भी आजकल लेख ढूंढने पड़ते हैं रीडर व्लाग में ऐड भरे रहते हैं लेख पढने के लिए बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

श्री बिष्ट जी १९६५ के युद्ध से तीन वर्ष पहले चीन भारत का युद्ध हुआ था मेरे पिता जी पेंशन आफिस में अकाउंट आफिसर थे जब वह शाम को घर आते थे बहुत दुखी मेरी माँ बताती हैं खाना भी नहीं खाते थे उस समय इतनी कम उम्र की विधवायें थी सफेद दुपट्टे से ढका सिर रो कर सूजी आँखें कईयों की उम्र 18 से अधिक नहीं होती थी उस समय सिपाही अधिक मरे थे बर्फ में युद्ध हो रहा था सोल्जर के पैरों में कपड़े के जूते थे १९६५ में ३००० शहीद थे | हमारी हालत अब अच्छी थी इस लड़ाई में कई अफसर शहीद हुए थे |मुझे याद है जब सोल्जर जाते थे नारे लगाते जाते थे |अब तो आतंक वाद में अचानक शहीद हो जाते हैं


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