Vichar Manthan

Mere vicharon ka sangrah

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ईद का अर्थ ख़ुशी अर्थात खुशियों का पर्व ?" जागरण जंगशन "

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ईरान प्रवास के दौरान ईद की सुबह थी मेरे पति के प्रिय पठान दोस्त डॉ हुनरगुल उनकी पत्नी सूफिया हमारे घर आये हम उन्हें देख कर हैरान थे | हुनर गुल हम सबको खुदा हाफिज कह कर अपने शहर पेशावर पाकिस्तान लौट गये थे वहाँ उनकी सरकारी नौकरी थी | अब दुबारा उनसे मिल पायेंगे ऐसी उम्मीद नहीं थी | ईद के दिन लोग अपने घर जाते हैं वह ईद से तीन दिन पहले लौट कर फिर परदेस नौकरी करने के लिए वापिस आ गये |ऐसी क्या मजबूरी थी उन्हें वापिस आना पड़ा ? मैने उनके लिए उनकी पसंद का शाका हारी खाना और खीर बनायी वह अनमने से खा रहे थे | ईद ख़ुशी का अवसर था परन्तु पति पत्नी के चेहरे पर गहरी उदासी थी वह हमसे अपना दुःख बाँटने आये थे |उन्होंने बताया पठानों में रिवाज है एक बार परिवार में बटवारा होता है जिसकी जो कमाई होती है वह घोषित करता है कोई झूठ नहीं बोल सकता बीच में कुरान रखी जाती है मैं अकेला विदेश गया था आप तो जानते हैं मैं बार्डर एरिया में पैसे के लिए रहा जिससे अधिक से अधिक डालर कमा सकूं आगे पढ़ने के लिए वियाना जाना चाहता था सरकारी नौकरी थी एक बार हाजिर हो कर फिर छुट्टी लेनी थे लेकिन मुझे सपने में भी ख्याल नहीं था वहाँ जाते ही बटवारे की बात होगी मेरे भाई जान कहते थे तुम जितना चाहते हो पढ़ो अब्बा के पास एक खेत था वह भी तुम्हारे जाने के बाद छोटे भाईयों ने बेच लिया अम्मी मेरे पास रहती हैं सब तुम्हारी अपनी कमाई है बटवारा कैसा ? लेकिन जैसे ही मैं अपने देश लौटा मुझसे छोटे भाईयों ने गावं के बड़े बुजुर्ग बुलाये गये बीच में अम्मी को भी बिठाया गया साथ ही बंदूक रख बटवारे की बात चलाई | मेरे बड़े भाई ने सबके लिए बहुत किया था जब सब अपने पैरों पर खड़े थे उन्होंने अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए पैसा जोड़ा घर पर प्रेक्टिस भी करते थे आमदनी अच्छी थी और किसी भाई के पास कुछ नहीं था | हमारे आठों भाईयों में मेरे और भाई के पैसे का बटवारा होना था | मेरा चेहरा काला पड़ गया था | मेरे एक भाई ने कहा बाबू साहेब आप तो ढेरो कमा लेंगे आपका क्या हमसे पूछो कैसे गरीबी में दिन काट रहें हैं मेरे सामने बंदूक थी एक बार मन में आया इसे उठा कर सबको मार दूँ परन्तु इल्म के हाथों मजबूर था मैने अपना पैसा विदेश मे डालर में रखा था सुबह ही भाईयों ने आकर अपने हिस्से का चैक मुझसे ले लिया|
मैने कभी अपनी बीबी के लिए जेवर नहीं लिया सोचा था सुफिया की नौकरी है वह पेशावर रहेगी अम्मी को गाँव से साथ ले आयेंगे मैं परदेस में पढ़ाई कर लूंगा वह दोनों रो पड़े |हम जानते थे बार्डर पर सेवा करना कितना मुश्किल है कभी भी हमला होता था डॉ हुनर गुल इन्सान नहीं फरिश्ता थे बंकर में भी नहीं जाता थे हर वक्त जख्मी की सेवा उनका धर्म था | यह उस जमाने का कानून था जब कोई अंतर्राष्ट्रीय बार्डर नहीं होता था कहीं भी निकल गये कमा लाये नहीं तो लूट लाये| हमने पूछा अब आपके पास कुछ बचा है | उन्होंने बताया कुछ नहीं पहले से तय था अम्मी मेरे साथ रहेंगी उनकी देखभाल अच्छी हो सकेगी | मैने बचा पैसा भाईजान को दे दिया वह ले नहीं रहे थे ,जब तक मैं परदेस में हूँ अम्मी को कोई तंगी न हो भाई जान कलप रहे थे हाय तेरी नेक कमाई थी और तेरे हाथ खाली हैं ,भाभी जान सिर झुकाए बैठी थी | मेरी नेक भाभी उनके बच्चे बड़े हो गये थे पढ़ते थे भाई को फिर से कमर कसनी थी |
डॉ हुनर गुल के अब्बा नौर्थ वेस्ट फ्रंटियर के गरीब किसान थे उनके आठ बेटे और एक बेटी थी बड़ी गरीबी से दिन गुजरते थे |उन भाई बहनों को ईद के दिन कपड़ों में पठानी कमीज मिल जाये बहुत बड़ी बात थी छोटे बच्चों को सलवार भी नसीब नही हो पाती थी सलवार पुरानी फटी ही पहननी पडती थी या वह भी नहीं | कुछ बड़ा होने पर ईद के लिए वह सब छोटा मोटा काम कर थोड़े से पैसे जमा कर तब जाकर मेला देखने जाते थे परन्तु पैसे इतने कम होते थे कुछ भी खरीद नहीं सकते थे | उनके बड़े भाई को वहाँ के सरकारी अस्पताल में कम्पाउंडर की नौकरी मिल गई उनकी तनखा से घर चलता था वह घर -घर जा कर सुई पट्टी जैसे कुछ काम कर लेते थे जिसके बदले में लोग सौगात में अंडे या मुर्गी देते थे |हुनरगुल और उनसे दूसरे नम्बर का भाई पढ़ने में बहुत अच्छे थे | इनका एडमीशन डाक्टरी में हो गया छोटे भाई का इंजीनियरिंग में लेकिन एडमिशन के पैसे नहीं थे फ़ीस जमा करने के लिए कराची बन्दरगाह पर मजदूरी करने के लिए गये जहाँ वह लोडर का काम कर इतने पैसे ला सके जिससे एडमिशन हो सके आगे का खर्चा उनके बड़े भाई जान को उठाना था |भाई जान बहुत मेहनत करते थे अब वह दूर दराज पहाड़ी गावों में सुई पट्टी करने जाने लगे लम्बे काम करने पर जैसे आपरेशन के बाद की पट्टियाँ ,खाते पीते लोग उन्हें साल छमाही दुम्बा दे देते थे उसे भी बेच कर वह भाईयों की किताबों का खर्चा उठाते थे | उन्होंने बताया हम ईद पर कभी घर नहीं जा सके |बचपन में भी लगभग आधी अधूरी ईद होती थी इतनी गरीबी ऊपर से इतने बच्चे |हर छुट्टी में उन्हें आगे की पढाई चलाने के लिए कराची बन्दरगाह मजदूरी करने जाना पड़ता था| मैने कहा आप ट्यूशन कर खर्चा उठा सकते थे उन्होंने कहा हम अफरीदी पठान हैं हमारी कौम जाहिलों से भरी हैं उन्हें अपने एरिया में विकास भी नहीं चाहिए न बिजली न सड़क पढ़ने का सवाल ही नहीं बहुत कम लोगों के बच्चे पढ़ते थे ज्यादतर लोग अफीम की खेती करते हैं अत: वह सेना या पुलिस को उधर आने नहीं देते | आपसी रंजिश में एक दूसरे पर बंदूके तान कर कहते “मुझ पर खून सवार है या तू मुझे मार दे नहीं तो मैं तुझे मार दूंगा |” शिक्षा ने मुझे समझदार लेकिन बुजदिल बना दिया | इस कष्ट से उनकी पढाई पूरी हुई| भाई की इंजीनियरिग पहले खत्म हुई उसे सरकारी नौकरी मिल गई समझ लीजिये होश में पहली ईद थी जो बड़ी धूमधाम से मनाई गई परन्तु अभी ईदी देने की हैसियत नहीं थी | जब मेरी नौकरी लगी अम्मी जान ने सबको ईदी दी उस दिन अम्मी सारा दिन अल्लाह का शुक्र अदा कर रोती रही अब्बा पहले ही फौत कर गये थे | हम सबकी आँखों में पानी आ गया |हुनर गुल जिस परिवार में ज्यादा बच्चे देखते थे दुखी हो कर कहते थे क्यों इतने बच्चे पैदा करते हो क्या इन्हें गिदा ( भिखारी )बनाओगे ?
सुफिया मेरी प्यारी सहेली मैं उसे कभी नहीं भूली न वह मुझे भूली होगी उसकी एक ही इच्छा थी एक ऐसा बेड़े ( आंगन) वाला घर जिसमें एक तरफ भाभी रहती हो दूसरी तरफ वह ,दिन भर अपने अपने छज्जे पर बैठ कर गप्पें मारें | उसके पिता और डॉ हुनरगुल के पिता दोनों बचपन के दोस्त थे वह फौज में भरती हो गये लेकिन हुनरगुल के अब्बा ने गाँव नहीं छोड़ा लेकिन अपनी दोस्ती को और मजबूत करने के लिए सूफिया और हुनर गुल को बचपन मे नाम जद ( रिश्ता पक्का ) कर दिया सुफिया दो भाई बहन थे उसके बड़े भाई पाकिस्तान आर्मी में कर्नल थे वह काफी समय तक सऊदिया की मिलिट्री सर्विस में रहे और सूफिया एक टीचर थी | मैंने एक दिन सूफिया से पूछा यदि हुनरगुल डाक्टर नहीं होते तो क्या आपकी शादी होती? सुफिया ने बताया न करने पर इतना खूनखराबा होता आप सोच नहीं सकती पठान अपनी जुबान से नहीं फिर सकते| सुफिया की तकदीर बहुत अच्छी थी डॉ हुनरगुल ने बताया सूफिया के काबिल बनने के लिए मैं पढ़ा ,कराची के बन्दरगाह में बोझा ढोया हैं |
शानदार हंसों का जोड़ा लगता था दोनों लम्बे छरहरे, जहीन थे | अब वह सदा के लिए ईरान छोड़ रहे थे हुनर गुल को पढने जाना था वह अपनी बीबी को भी साथ ले जा रहे थे | में जम कर बर्फ पड़ रही थी सूफिया ने अपने शौहर से कहा हुनर गुल तुमसे जीवन में कुछ नहीं मांगूगी बस ईरान को खुदा हाफिज करने से पहले भाभी और डाक्टर साहब से मिला दो| हुनर गुल मजबूत गाड़ी के पहियों में जंजीर लपेट कर सुफिया को मुझसे मिलाने लाये सूफिया की गोद में उनका पहला बेटा था | रात भर रह कर जब वह लौटे सुफिया ने कहा मेरी कब्र में सोयी रूह भी आपको याद करेगी खुदा हाफिज हमेश |गाड़ी धीरे धीरे बर्फीली पहाड़ी पर चढ़ती रही हम परिवार सहित उनको जाते देखते रहे बच्चे अपने चाचा चाची के लिए रो रहे थे | हमारे अपने लगने वाले दुश्मन देश के बाशिंदे , उनके और हमारे बीच में अब लम्बी सरहद है जहाँ गोलियाँ और गोले चलते रहते हैं सरहद की हिफाजत के लिए जान हथेली पर रख कर सैनिक हर समय तत्पर रहते हैं | हजारों आतंकी हमारी सीमा में घुसने के लिए तैयार खड़े हैं |कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया गया हैं| पाकिस्तानी हकूमत ,आर्मी और हाफिज सईद जैसे सिर फिरे रोज धमकियाँ देते रहते हैं हिन्दुस्तान जैसे विशाल परमाणु शक्ति से सम्पन्न देश को अपनी परमाणु शक्ति होने का भय दिखाते है| अब हमसे सब कितने दूर हैं |
डॉ शोभा भारद्वाज

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anil Bhagi के द्वारा
July 8, 2016

आपका लेख पढ़ क्र दिल भर आया आपने नार्थ वेस्ट फ्रंटियर वहां के हालात पठानों के बारे में जानकारी दी अधिक बच्चों का दुःख कई बार आँखें भर आई

rameshagarwal के द्वारा
July 8, 2016

जय श्री राम शोभा जी आपके दोस्त डॉ हुनरगुल की दास्तान सूनी बहुत अफ़सोस हुआ.पिता की जायदाद में बटवारा सुना लेकिन भी की सम्पति में नहीं.वैसे परिवार की वजह से हमने बहुत दुःख उठाया लेकिन सब कर्मो का फल होता.लेख पढ़ कर सब पता चला.सुन्दर लेख के लिए बधाई .

sadguruji के द्वारा
July 8, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! ये अत्यन्त मार्मिक संस्मरण दिल को छू गया ! बहुत अच्छी प्रस्तुति हेतु हार्दिक आभार ! आपके लेख पढ़के भी कमेंट नहीं दे पाता हूँ ! हमारे गाँव में नेट की बहुत ज्यादा समस्या है !

Shobha के द्वारा
July 9, 2016

अनिल जी मेने केवल उनकी कहानी लिखी है हर शब्द सच है मेने उनके बोलने का लहजा भी उन्हीं की तरह दिया है लेख पढने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
July 9, 2016

श्री रमेश जी लेख पढने के लिए धन्यवाद पठानों का रिवाज है सारी जायदाद बटती है लेकिनं दो भाईयों की कमाई मुझे भी आश्चर्य हुआ था परन्तु जो लोग उनके तरीके को जानते थे वःकह रहे थे खून खराबा हो जाता यदि यह विरोध करते |रमेश जी विदेश जाने वालों के साथ यही होता है जब आप वापिस आते हैं सबकी आँखे बदल जाती हैं सम्बन्धों में भी दरार आ जाती है आपकी सम्पत्ति लाये पैसे को बहुत बड़ा आंका जाता है

Shobha के द्वारा
July 9, 2016

श्री सद्गुरु जी लेख पढने के लिए धन्यवाद दुनिया सब एक जैसी होती है हमारी आँखों में कई बार आंसू आये थे आज भी पठान जो फौज में हैं वह ऐश से रहते हैं वाकी सब अफीम की खेती करते हैं वः हमारे यहाँ व्ही भेजी जारी है उनकी सन्तान खाये तो जान से मार डालते हैं

dr ashok bhardwaj के द्वारा
July 9, 2016

मेरा विचार रहा है भूख इन्सान को चैम्पियन बनाती है इसका उदाहरण डॉ साहब उनके भाई थे लेकिन बाकी भाई ऊपर वाले के भरोसे बैठे रहे बाकी बहुत बच्चे जिनको आप पाल न सको भी उचित नहीं है ईद पर लिखा गया एक परिवार के घर में मनाई जाने वाली ईद का बहुत अच्छा वर्णन

Shobha के द्वारा
July 10, 2016

ईद का अर्थ ख़ुशी कितनी ख़ुशी से ईद मनाई गयी पूरे परिवार ने एक साथ बैठ क्र खुशिया बांटी लेख पढने के लिए अतिशय धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
July 10, 2016

आदरणीया डॉ. शोभा भारद्वाज जी, सादर अभिवादन! आपका हर आलेख आपके अपने अनुभवों से भरा पड़ा है. आपके लिखने की धाराप्रवाह शैली और गजब का अपनापन सबकुछ सर झुकाने को मजबूर कर देता है. क्यों नहीं और मुस्लमान डॉ. हुनर गुल और सोफिया जैसे होते हैं? हर मनुष्य में वही आत्मा है फिर क्यों कोई क्रूर बन जाता है और दूसरा दयालु. सादर!

Shobha के द्वारा
July 10, 2016

श्री जवाहर जी लेख पढने के लिए बहुत धन्यवाद डॉ हुनर गुल कहते थे इल्म सही इल्म इन्सान की सोच बदल देती है देखिये एक्टर इरफान ने जानवरों की कुर्बानी पर सवाल उठाया है जवाहर जी मै जबर्दस्त श्रोता हूँ अप लोगों के लेख पढ़ कर लिखना सीख गयी |

Shobha के द्वारा
July 11, 2016

अपर्णा भारद्वाज ने सिंगा पुर से फेस बुक द्वारा लेख पढ़ कर अपने विचार लिखे है Bahut achcha likha hai maa…mujhe kuch kuch yaad hai ..tumne bahut achche context mein describe kiya hai aur emotions bahut deep hain.

Shobha के द्वारा
July 11, 2016

राजू तुम्हें सूफिया आंटी याद हैं तुम उनके साथ जम कर शरारतें करते थे तब तुम छोटी थी तुमने लेख पढ़ा मुझे बहुत अच्छा लगा नन्हीं अटक अटक क्र हिंदी पढ़ता है उसने भी पढ़ा उसे भी काफी बातें याद हैं |

Ashish Kumar Trivedi के द्वारा
July 14, 2016

बहुत सुंदर विवरण

Shobha के द्वारा
July 14, 2016

धन्यवाद आशीष जी

Shobha के द्वारा
July 14, 2016

धन्यवाद आशीष जी


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