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मैक्यावली की रचना ‘दी प्रिंस’ की प्रासंगिकता कभी कम नहीं हुई

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mayaavli1 मैक्यावली इटली के महान दार्शनिक थे उनकी पुस्तक ‘दी प्रिंस’ भारत में भी अधिकाश राजनेताओं की पुस्तकों की आलमारी में सजी रहती है . पुस्तक एक शक्तिशाली राज्य की कल्पना तथा व्यवहारिक शासन कला का दर्शन है . पुस्तक का प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद 1531 में हुआ .पुस्तक पर रोमन कैथोलिक चर्च ने रोक लगा दी थी. विश्व भर में यह पुस्तक राजनीतिक क्षेत्रों में प्रिय और प्रसिद्ध है उनके विचारों को मैक्यावलिजम कहा जाता है इन्हे कुछ विचारक आधुनिक राजनीति विज्ञान का जनक मानते. अकसर इस कूटनीतिज्ञ की तुलना चाणक्य से करते हैं लेकिन दोनों के विचारों में सैद्धांतिक अंतर है .दी प्रिंस नवनिर्वाचित प्रिंस सत्ता पर अपनी पकड़ कैसे मजबूत करे का दर्शन है . वह राज्य को शक्तिशाली सुसंगठित सम्प्रभु राज्य के रूप में देखना चाहते थे . मैक्यावली के आलोचकों की संख्या बहुत है उनकी पुस्तक में तानाशाहों के आचरण की सटीक व्याख्या है. उनकी कितनी भी आलोचना की जाये वह राजनेताओं के दिलों और आचरण में वह बसते हैं . सत्ता के नये अधिकारी को उन्होंने प्रिंस का नाम दिया उनका प्रिंस तानाशाह है .
उनके अनुसार प्रिंस चार प्रकार के हैं -1.वंशानुगत राजा ,राजा का पुत्र सिंहासन का अधिकारी होता है राजा की मृत्यु के बाद पुत्र का सत्ता पर अधिकार होता है . लेकिन नये प्रिंस को अपनी योग्यता का प्रभाव प्रजा पर शीघ्र डालना चाहिए .वह साधन नहीं साध्य को प्रमुख मानते थे
2. विजेता राजा किसी राज्य पर कब्जा कर सत्ता प्राप्त करता है . वह अपने विरोधियों को कुचल कर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा है . उसे अपने सहयोगियों से समझौते भी कम करने पड़ते हैं
3.भाग्य से सत्ता या कौशल से सत्ता हाथ में आ जाना या राज्य के अंदर समर्थक किसी ऐसे व्यक्ति को सत्ता सौंप देते हैं जिसे आस्कमिक रूप से ,भाग्य वश समीकरण बैठाने के दौरान सत्ता हासिल हो जाती है परन्तु उनकी दया पर निर्भर है जिन्होंने सत्ता में मदद की थी .यह सत्ता स्थायी नहीं होती हाँ नया प्रिंस योग्यता से उसे स्थायी बना सकता है .यह सत्ता समर्थकों की संख्या में वृद्धि कर या युद्ध द्वारा बचाई जा सकती है .ईरान में प्रजातंत्र के लिए संघर्ष चल रहा था लेकिन सत्ता संघर्ष में इस्लामिक शक्तियों के हाथ में सत्ता आ गयी विरोध जारी था लेकिन इराक ने ईरान पर हमला कर दिया इसे सुअवसर समझ कर इस्लामिक शक्तियों ने युद्ध के बहाने पकड़ मजबूत कर ली .
4.चर्च के अधीन राज्य जैसे रोम
सैन्य शक्ति – मैक्यावली के अनुसार सैन्य शक्ति से प्रिंस का महत्व बढ़ता है .उसे सेना को अपनी शक्ति से अपने आधीन रखना चाहिये . सेना का संगठन – 1 . युद्ध की स्थिति में पैसा देकर सेना का गठन करना . इब्राहीम लोदी के समय बाबर ने देश पर हमला किया इब्राहीम की सेना में एक लाख सैनिक थे यह सब अस्थायी सैनिक थे लेकिन बाबर ने चुस्त दुरुस्त सेना के बल पर इब्राहीम लोदी को हरा कर दिल्ली के तख्त पर कब्जा किया 2.किसी और राजा से सैनिक सहायता लेना य सामरिक सन्धियाँ करना .3 .अपनी स्वयम की सेना का गठन करना . 4.दोनों प्रकार की सेना अपनी सुसंगठित सेना के अलावा समय पर धन से सैनिक प्राप्त करना .
प्रिंस को सैनिक मामलों को समझना चाहिए युद्ध कला की जानकरी होगी सेना उसका सम्मान करेगी वह अपने सैनिकों पर नियन्त्रण रख अपनी सत्ता को सुरक्षित कर सकता है . प्रिंस को युद्ध से डरना नहीं चाहिए उसमें आलस्य नहीं होना चाहिए .वह तुरंत कार्यवाही में सक्षम हो युद्ध के समय उसका ध्यान पूर्ण रूप से विजय पर केद्रित होना चाहिए . संगठित और अनुशासित सेना ,अनुशासनहीन कायरों की सेना जिसे पैसे से गठित किया गया है पर भारी पड़ती है .आज प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अलग रक्षा विभाग हैं हर राज्य अपनी सेना को आधुनिक हथियारों से लैस रखता है सैनिकों को मिलिट्री ट्रेनिग द्वारा युद्ध कौशल सिखाते हैं.पड़ोसी राज्यों से नो वार पैक्ट किये जाते हैं .

प्रिंस- सैद्धांतिक रूप से प्रिंस में सद्गुणी हो लेकिन अवसर आने पर सद्गुणों का परित्याग करने के लिए भी तत्पर रहें . जनता को भयभीत रखे . आदर्श एवं अच्छाई हर वक्त नहीं चल सकती प्रिंस यदि उदार है जन हित पर धन खर्च करता है जनता की मांगें बढती जायेंगी निरंतर मांगे पूरी करने से राज्य की आर्थिक दशा खराब हो जाएगी नये टैक्स लगने से कर दाता प्रिंस से नफरत करने लगते हैं नफरत से बचना है जनता प्रिंस से प्यार करे या न करे डरे ,भय नफरत तक न पहुंचे यह प्रिंस को चुनना है जिससे डरते हैं उसे चोट नहीं पहुंचाना चाहते ,भयंकर बनें पर अति न हो वह न अधिक दयालु हो न क्रूर लेकिन समय आने पर क्रूरता दिखा सके वादे करे परन्तु वादों पर अड़ा न रहे जरूरत के हिसाब से वादों से पलट सकता है .ऐसा लगना चाहिए जैसे प्रिंस जनता के लिए बहुत कर रहा है और करेगा उसका विश्वास बढ़े और साध्य पूरा हो . इस कला में आज के राजनेता निपुण हैं .प्रिंस चाटुकारों से दूरी बना कर रहे ,सलाह ले लेकिन ऐसे दिखाए जैसे उसको उनकी सलाह की जरूरत नहीं है .महान पुरुषों की नकल कर अपनी महानता का प्रचार करे . प्रिंस को किसी की सम्पति और महिलाओं में हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए .
प्रिंस को विजय कैसे प्राप्त हो- लोग बदलाव नहीं चाहते, सत्ता का लाभ उठाने वाले लाभ से वंचित नहीं रहना चाहते . प्रिंस को विजित होने के बाद उनके विरोध का सामना करना पड़ता है नये लोग बदलाव चाहते हैं जिससे उनको लाभ मिले राजा सबको खुश नहीं रख सकता लेकिन नये सुधारों का विरोध कम होता हैं क्योंकि उनसे नागरिक अनजान होते हैं . हर व्यक्ति की अपेक्षाओं पर प्रिंस के लिए खरा उतरना भी आसान नहीं है जब सत्ता अपने बल पर मिलती है योग्यता से स्थायी रहेगी अपने समर्थकों को अपने पास रखों उनकी संख्या बढाओ वही आगे प्रिंस को बचायेंगे कई बार क्रिमिनल प्रवृति के लोग सत्ता हासिल कर लेते हैं लेकिन उनकी क्रूरता से लोग नफरत करते हैं क्रूरता करनी है तो शीघ्रता से करनी चाहिए अपने विरोधियों को जल्दी ही कुचल डालो सद्दाम ने जब सत्ता हासिल की थी अपने अभिजात्य वर्ग के समर्थकों को एक साथ बुलाया मार डाला था मारने के बाद सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत किया .बरसों सुन्नी होते हुए भी शिया बहुल प्रदेश पर राज्य किया था .यह मैक्यावली के प्रिंस की विशेषता है .
प्रिंस के सहायक कभी उससे अधिक योग्य न हों उनसे खतरा रहेगा .ऐसे लोगों को विश्वास में लें जो अपने दम पर कुछ नहीं कर सकते . नये राजकुमार को अपने महान कार्यों से सम्मान मिलता है कार्य दूसरे करें लेकिन खाते में प्रिंस के जाएँ इसे हम अपने देश में देख सकते हैं जो भी सुधार थे वह गाँधी परिवार के खाते में गये बदनामी डॉ मनमोहन सिंह को मिली .
मैक्यावली के समय सत्ता पर चर्च का बहुत प्रभाव था चर्च से रिश्ता तोड़ कर राजनीति को कूटनीति से जोड़ा .वह ऐसे प्रिंस का समर्थक था जो अपनी सीमाओं का विस्तार कर विजित प्रदेश को पर स्थायी अधिकार करे .विजित प्रदेश में धूमधाम से प्रवेश करे विद्रोहियों का दमन करे . दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए ऐसा होता रहा है . अधिकार के बाद वहाँ शांति और सम्पन्नता बढ़ाना राज्य की सीमाओं को निरापद करना पड़ोसियों में भय बनाये रखना प्रिंस का महत्वपूर्ण कार्य हैं .सिकन्दर ने ईरान पर हमला किया उसके साथ उसके गुरु अरस्तु भी थे .ईरान के शिराज शहर के पास बसे खूबसूरत महत्वपूर्ण शहर परसीपोरस को जला दिया पूरा राजवंश खत्म कर दिया एक बच्चा बच गया था .गुरु के आदेश पर उसे भी मार डाला . मैक्यावली इसी धारणा में विश्वास करता था .
आज भी प्रजातंत्र में भी प्रिंस के गुण दिखाई देते हैं चाटुकार अपने नेता की जयजयकार करते रहते है वक्त आने पर धोखा देते हैं स्वर्गीय राजीव गाँधी की आलमारी में ‘दी प्रिंस’रहती थी उनकी पत्नी  मैक्यावली के देश इटली की थीं  लेकिन वह अपने वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को पहचान नहीं सके उनसे धोखा खाया .
डॉ शोभा भारद्वाज

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Arti Patel के द्वारा
July 22, 2016

1948 में जब देश में कांग्रेस का स्वामित्व था , तब वह आरएसएस को गांधी जी का हत्यारा घोषित करने में विफल रही और आज जब कांग्रेस खुद का अस्तित्व बचने के संकट से जूझ रही है तब राहुल गांधी जी को ऐसा कदम पुनः नहीं उठाना चाहिए . ऐसा करके राहुल जी युवा वर्ग में अपनी छवि ख़राब कर रहे है – आरती पटेल [१६] , पी दी नगर उन्नाव

Avdhut के द्वारा
July 23, 2016

मैडम जी बहुत ही सुन्दर लेख पुरे द प्रिंस की व्याख्या आज के वर्तमान परिवेश में कर दिया आपने

Shobha के द्वारा
July 23, 2016

आरती जी मेने आपका लेख पढ़ा था आपने अच्छे ढंग से जब देखो आरएसएस पर ऊँगली उठायी जाती है वह महात्मा गाँधी जी के हत्यारे हेब तर्क संगत ढंग से अपनी बात समझया अच्छे विचार

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
July 23, 2016

बहुत बढ़िया माता श्री !

Rajeev Varshney के द्वारा
July 24, 2016

आदरणीय शोभा जी, विदेशी दार्शनिक के दर्शन से परिचित कराने के लिए धन्यवाद.  सुन्दर, सार्थक और सामयिक लेख. सादर, राजीव

Shobha के द्वारा
July 26, 2016

श्री अवधूत जी मेक्यावली की विचारधारा कभी मरी नहीं है उसे दुनिया के हर सत्ताधारी में देखा जा सकता है लेख पढने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
July 26, 2016

प्रिय जितेन्द्र लेख पढने के लिए बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
July 26, 2016

श्री राजिव जी लेख पढने के लिए अतिशय धन्यवाद मेंक्यावली पहला दार्शनिक था जिसने राजनीती में छल नीति का प्रवेश किया

drashok के द्वारा
July 26, 2016

मैक्यावली की किताब नेताओं और तानाशाहों की किताब की आलमारी में रहती हैं और दिल में मैक्यावली के विचार राजनीति के जितने छल प्रपंच है किसी भी तरह से सत्ता हथियाना बड़े -बड़े वादे करना परन्तु सत्ता मिलते ही भूल जाना अपनी छवि को ऐसे प्रस्तुत करना जैसे उनसे महान कोइ नहीं है बस अब प्रिंस का रूप बदला है और कुछ नहीं

Shobha के द्वारा
July 27, 2016

आपने सही समझा है राजनीती विज्ञान के पहले विचारक थे जिन्होंने राजनीती में कूटनीति को स्थान दिया

anjna bhagi के द्वारा
July 27, 2016

शोभा दीदी मैने एम ए में अंतरराष्ट्रीय राजनीती में मैक्यावली और दी प्रिंस पढा था परन्तु समझ नहीं आया न प्रिंस को समझ सकी लेकिन आप ने समझा दिया नये प्रिंस को सत्ता किस तरह से पकड़नी है और प्रिंस में क्या चालाकियां होनी चाहिए

Shobha के द्वारा
July 28, 2016

मेक्यावली को समझना आसान नहीं था मेरी भी समझ में देर से आये जब मैने चाणक्य को पढ़ा

sadguruji के द्वारा
July 28, 2016

आदरणीय डॉ शोभा भारद्वाज जी ! अच्छी और पठनीय पोस्ट हेतुं हार्दिक अभिनन्दन ! इटली के महान दार्शनिक मैक्यावली के बारे में पढ़ा था, किन्तु आपके लेख से और जानकारी मिली ! आपने सही लिखा है कि मैक्यावली के समय सत्ता पर चर्च का बहुत प्रभाव था ! मैक्यावली ने चर्च से रिश्ता तोड़ कर राजनीति को कूटनीति से जोड़ने का सुझाव दिया ! भारत के नेता मैक्यावली से भी दो कदम आगे हैं ! वो धार्मिक संस्थाओं से भी गहरा रिश्ता रखते हैं और शातिर कूटनीतिक चालें भी चलते रहते हैं ! सादर आभार !

rameshagarwal के द्वारा
July 28, 2016

जय श्री राम शोभाजी हमने कभी मैकियावली का हमने कभी नाम नहीं सुना था आपके लेख से पता चला.चर्च का सत्ता पर बहुत दिनों शिकंजा था हमारे यहाँ भी राज्गुरो की व्यवस्था थी लेकिन वे रजा की सालक देते थे जिससे कोइ गलत कार्य न हो सके.आज कल तो राजनीति हमारे देश में इतनी गंदी हो गयी की शर्म आती क्या लालू,नितीश,मुलायम,मायावती,ममता और भौखलाया केजरीवाल मैक्यावली की राजनीति कर रहेप्रकाश डालियेगा ऍसुन्दर लेख के लिए साधुवाद.

Shobha के द्वारा
July 28, 2016

श्री सद्गुरु जी आपने मेरा लेख मैक्यावली पढ़ा बहुत ख़ुशी हुई आपने और आगे बढ़ कर चर्च और मेक्यावली के सम्बन्धों पर प्रकाश डाला सही लिखा है आपने हमारे यहाँ तो प्रजातंत्र में भी मेक्यावली ज़िंदा है मेने यह लेख बहुत त मेहनत से लिखा था सोच रही थी पता नहीं पाठक पढ़ेंगे या नहीं अतिशय धन्यवाद

Shobha के द्वारा
July 28, 2016

श्री आदरणीय रमेश जी विश्व में तिन कूटनीति के दर्शन शास्त्री हुए हैं चाणक्य , सिकन्दर के गुरु अरस्तु और 15 विन शताब्दी में मेक्यावली इनके आधार पर आगे जा क्र योरप नें तानाशाही को समझा इटली में मुसौलिनी आया उसने हिटलर के साथ मिल क्र वर्ड वार लड़ी बहुत खतरनाक दार्शनिक था इसे सभी पढ़े लिख्र राजनेता जानते हैं और आजकल केजरी वाल उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रहे हैं देख लीजिये अपने कामों का खुद ही गुण गाते हैं मोदी जी के समकक्ष अपने आप को सिद्ध करते हैं हर वक्त चिल्लाते हैं वःह विक्टिम हैं आगे में चाणक्य की कूटनीति पर लिखूंगी विश्व दार्शनिक दोनों को समान बताते है लेकिन चाणक्य ने साध्य को भी उत्तम माना है

meenakshi के द्वारा
August 23, 2016

शोभा जी सादर अभिवादन ! आपका हर लेख बहुत ज्ञानवर्धक होता है . उपर्युक्त लेख पर भी आपने इटली के मैक्यावली की विचारधारा से अवगत तो कराया ही साथ ही अपने देश की राजनैतिक पहलू को भी दर्शाया .बहुत कुछ तुलनात्मक द्रश्य उकेरे. शुभकामनाएं !

Shobha के द्वारा
August 23, 2016

प्रिय मीनाक्षी जी मेक्यावली के दर्शन सभी राजनेता प्रभावित हैं उनके बारे में जानना चाहते हैं उनकी पुस्तक प्रिंस पढना चाहते है उनकी कुछ विचारक चाणक्य से तुलना करते हैं लेकिन दोनों की विचार धारा में बहुत अंतर है चाणक्य साध्य और साधन की पवित्रता पर बल देते थे लेख पढने के लिए बहुत धन्यवाद


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