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श्री कृष्ण नीति ( राजनीतिज्ञ , कूटनीतिज्ञ भगवान श्री कृष्ण )

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मेरे ननिहाल में 180 वर्ष पुराना पर्सनल मन्दिर की  राधा कृष्ण की युगल मूर्ति

देवपुत्र पांडव ,यज्ञ की अग्नि से जन्मी द्रौपदी अपना सब कुछ गवाँ कर तेरह वर्ष के लिए वनवास जा रहे थे |महामंत्री विदुर से राजा धृतराष्ट्र ने कहा हे विदुर पांडू पुत्रों और द्रौपदी के वन गमन का वर्णन करो, हस्तिनापुर की प्रजा की प्रतिक्रिया क्या है कहो? विदुर ने कहा हे राजन मुख्य द्वार से सबसे पहले द्रौपदी बाहर आई जिसकी सुन्दरता और तेज अतुलनीय हैं उसने अपने दोनों हाथों से चेहरा छुपा लिया है बहुत कारुणिक दृश्य है कुछ समय पूर्व की साम्राज्ञी के खुले केश हवा में लहरा रहे हैं केशों से भी उनका मुँह ढका हुआ हैं हृदय में उठने वाले मूक क्रन्दन से वह रह-रह कर काँप रहीं है | अनिष्ट सूचक विदुर हमने लक्ष्मी का अपमान किया है उसकी आँख से धरती पर गिरने वाला एक आंसूं विनाश कर देगा |कोरवों की स्त्रियाँ इसी तरह खुले केश क्रन्दन करेंगी| युधिष्टिर? उन्होंने वस्त्र से अपना चेहरा ढक लिया है उनकी नजरें धरती की तरफ झुकी हुई हैं वह संभल –सभल कर पैर रख रहें हैं जैसे धरती हिल रही है लम्बीं सांस ले कर कहा उनकी दृष्टि किसी को भी जला सकती है वह सोच रहे हैं पाप और अन्याय के बोझ से धरती हिल रही है यदि नहीं तो बनवास समाप्त होने के बाद ऐसा युद्ध होगा धरती कांप जाएगी | भीम ? राजन महाबली भीम की दशा विचित्र है वह बार बार अपनी भुजाओं से अपने कंधों को ठोक कर दांये और बांये देखते हुए लम्बी सांसे खींच रहे है वह सोच रहें हैं कितना मजबूर हूँ धिक्कार है मेरी भुजाओं के बल को एक दिन मैं भुजाओं से पीस कर हर कौरव को नष्ट करूंगा |विदुर, अर्जुन ?हे राजन वह सबसे पीछे चल रहे हैं बार बार झुक कर धरती से मुठी भर मिटटी और कंकड़ उठा कर हर दिशा में फेक रहे हैं, गांडीव से इतने वाण निकलेंगे युद्ध भूमि ढक जायेगी और नकुल नें अपने शरीर पर पीली मिटटी मली है ,महाराज नकुल की आँखें धरती में गड़ी हैं धिक्कार है ऐसे रंग रूप को अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सका और सहदेव? महाराज सहदेव ने चेहरे पर सफेद राख मली है |आप जानते हैं उसे नक्षत्रों और ज्योतिष शास्त्र का अद्वितीय ज्ञान है पर आकाश की और देख रहे हैं कुछ उँगलियों पर गणना कर रहे हैं | वह महाविनाश घड़ी की गणना कर रहा हैं 13 वर्ष के बाद ऐसा कौन सा नक्षत्र आयेगा जब शत्रु कुल का सम्पूर्ण विनाश हो जाएगा | प्रजा की प्रतिक्रिया क्या है ?राजपथ के दोनों और प्रजा सिर झुकाए खड़ी है उनकी आँखों से आंसू झर रहे हैं परन्तु मौन हैं |विदुर राज्य की शक्ति से भयभीत है लेकिन मूक प्रतिरोध है | दुर्योधन को संदेश भेजो मैने बुलाया है राजमद में झूमते दुर्योद्धन से धृतराष्ट्र ने कहा दुर्योद्धन एक क्षण भी शांत मत बैठना नारी के अपमान का भयानक प्रतिशोध ,भयानक युद्ध होगा अभी पांडव क्षीण हैं उन्हें नष्ट करने का यत्न करो यदि आमोद प्रमोद में लगे रहे तेरह पांडव  तप कर कुंदन बन कर निकलेंगे उनके साथ जनमत होगा ,मित्र राजाओं की सहानुभूति और महान राजनीतिज्ञ श्री कृष्ण का साथ जिन्हें समस्त भारत का भगवान मानता है  |

कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव पांडवों की सेना मरने मारने को तैयार आमने सामने खड़ी थी समय के महान राजनीतिज्ञ जिन्होंने राजनीति को नयी दिशा दी थी कूटनीतिकार द्वारिकाधीश अर्जुन के सारथि के रूप  हाथ रथ की डोर ले कर युद्ध के मैदान में विचलित अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे |

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम ||

परित्राणाय साधूनां  विनाशाय  च दुष्कृताम |धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

सामने हस्तिनापुर की द्यूत सभा के सभी पात्र खड़े थे | युधिष्टिर अपने भाईयों सहित अपमान का बदला लेने के लिये प्रतिज्ञा बद्ध थे| विपक्ष में कौरवों पांडवों के पितामह भीष्म हस्तिना पुर की रक्षा में समर्थ |हस्तिनापुर की द्यूतसभा में सम्राट युधिष्ठर जुये में सब कुछ हार चुके थे इंद्रप्रस्थ का राजपाठ अपने महान योद्धा पाँचों भाई यहाँ तक महारानी द्रोपदी को भी |दुर्योद्धन ने अपने छोटे भाई दुशासन को आदेश दिया जुए में हारी पांडवों की पत्नी अब उनकी दासी है राज्यसभा में लाया जाये |कुछ समय पहले की साम्राज्ञी जिसने सम्राट के साथ राजसूय यज्ञ किया था लाचार दीन हीन उसे लम्बे केशों से घसीटता दुशासन राजसभा में ला रहा था द्रौपदी पूरे बल से प्रतिरोध कर रही थी, राजसभा में ला कर पटका यहाँ भीष्म जैसे महान पितामह उन्होंने हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा का अपने पिता को वचन दिया था काश स्त्री की रक्षा का भी दायित्व समझते ,द्रोणाचार्य जैसे आचार्य , कर्ण जैसे महावीर और भी अपने समय के हस्तिनापुर के महान योद्धा उपस्थित थे| सिंहासन पर अंधा राजा धृतराष्ट्र आसीन था खुली आँखों वाले गूंगी बहरी सभा में दुर्योधन ने अपनी जंघाओं का इशारा करते हुए कहा आ दासी मेरी जंघा पर बैठा जा |भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्र हीन करने का आदेश दिया गया |अकेली निस्सहाय अपने सम्मान की गुहार धृतराष्ट्र से लगाई अविवेकी राजा पुत्र मोह में पागल था नितिज्ञ कहे जाने वाले सभासदों से ,दोनों कुलों के पितामह के सामने जा कर प्रश्न पूछा जब सम्राट अपने आप को हार चुके थे उन्हें मुझे जुए पर दांव लगाने का अधिकार किसने दिया? भीष्म ने राजसत्ता का मुकाबला करने के बजाय धर्म का सहारा लिया| आचार्य  द्रोण के पास भी बहाना था द्रौपदी उनके शत्रु द्रुपद की बेटी थी| अंगराज कर्ण को स्वयंवर में द्रौपदी सूतपुत्र कह कर प्रतियोगिता से बाहर कर चुकी थी वह वैसे ही जातीय भेद के शिकार थे |भीम ने क्रोध में प्रतिज्ञा की दुशासन ने द्रौपदी को केशों से घसीटा है उसके छाती के रक्त से केशों को सीचूंगा जिस जंघा पर दुर्योद्धन ने बैठने का इशारा किया था अपनी गदा से तोड़ दूंगा| अर्जुन भी बिलख उठे नकुल अग्नि लाओ जिन हाथों से द्रौपदी को दांव पर लगाया सम्राट के हाथ जला दूंगा लेकिन किसी ने न प्रतिकार किया न सभा का बहिष्कार, तेजस्वी नारी का तमाशा देखते रहे| द्रोपदी का रोद्र रूप ,बिरोध अंत में थक कर भगवान श्री कृष्ण को पुकारना सबने देखा दुशासन ने असहाय उस युग की नारी की साड़ी खींची द्रौपदी की हृदय विदारक पुकार श्री कृष्ण के कानों में पड़ी उन्होंने उनकी रक्षा की या उनके नाम का भय था आततायी खींचते- खींचते थक गया जो भी हुआ सभा के बंद कपाटों में हुआ| निढाल द्रौपदी अंत में गिर पड़ी अब अंधे राजा का विवेक जागा या उनकी पत्नी गांधारी ने जगाया |राजा ने पांडवों को जो भी हारा था लौटा दिया लेकिन द्यूतसभा में फिर से पांसे फेके गये अबकी बार हारने वाले को 12 वर्ष का बनवास और एक वर्ष अज्ञात वास का दंड भुगतना था|

बनवास और अज्ञात वास समाप्त हुआ श्री कृष्ण शांति दूत बन कर हस्तिनापुर गये पांडवों का अधिकार मांगा अंत में पांच गाँव पर समझौता करने के लिए तैयार थे  लेकिन गाँव राजनीतिक महत्व के  थे  दुर्योद्धन कुछ भी देने को तैयार नहीं था | उलटा श्री कृष्ण को कैद करने के लिए तत्पर दुर्योद्धंन को  विराट रूप दिखाया , कर्ण को उसके जन्म की कथा सुना  कर बताया वह ज्येष्ठ कुंती पुत्र पांडवों का भाई है दुर्योद्धन के पक्ष से तोड़ने का प्रयत्न किया  | सुलह नहीं हुई  अंत में भयानक युद्ध हुआ दस दिन तक भीष्ण पितामह ने युद्ध किया उन्होंने पांडवों को न मारने की प्रतिज्ञा की थी परन्तु सेना का भीषण संहार कर रहे थे सेना बिना युद्ध कैसा ? अंत में शिखंडी को आगे कर श्री कृष्ण ने अर्जुन से भीष्म पर ऐसे वाण चलवाये वह शर शैया पर गिर पड़े| गुरु द्रोण, श्री कृष्ण की कूटनीति ने युधिष्टिर को झूठ बोलने पर मजबूर किया पुत्र मोह से ग्रस्त, उसके झूठे वध का शोर सुन कर शस्त्र त्याग दिया उनका गला काट कर द्रौपदी के भाई ने प्रतिशोध लिया | दुशासन को भीम ने ऐसी सजा दी जिसे सदियाँ याद रखेंगी उसका सीना फाड़ कर रक्त पान किया और द्रौपदी के खुले केशों को रक्त में डुबोया| अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को सात महारथियों ने मिल कर मारा था उसकी मौत को ढाल बना कर श्री कृष्ण के आदेश पर कर्ण जब अपनी  शस्त्र विद्या भूल चुका था रथ का पहिया धरती में धस रहा था वह निहत्था था अर्जुन से मरवाया | श्री कृष्ण के पास हर वध का ओचित्य था अंत में विष बेल दुर्योद्धन की गदा युद्ध के नियम के विरुद्ध भीम को इशारा कर जंघा तोड़ कर मरवाया | महाभारत समाप्त हुई कूटनीतिज्ञ श्री कृष्ण का गीता का दर्शन सर्वत्र पूजित है| विश्व के सबसे पहले कूटनीतिज्ञ श्री कृष्ण साध्य की पवित्रता में हर साधन को उचित समझते थे  उन्होंने पांडवों के पक्ष से दुर्गम विजय को सुगम बना दिया |

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
August 26, 2016

जय श्री राम शोभा जी आपके लिखने की शैली बहुत अच्छी और प्रभवित करने वाली है.हम लोग केवल जन्माष्टमी मन लेते परन्तु भगवान् की शिक्ष्ये भूल गए.उन्होंने कहा की दुश्मन और आतंकवादी को कभी चोदना नहीं चाइये और अपने कर्तव्यों के पुरी तन्मयता से करनी चाइये.दुश्मनों को मारने में सब टीक है इन सीखो को हमसे अच्छा पच्छिम के देश करते न आतंकवादी और दुष्टो को छोड़ते और कर्त्तव्य संस्कृति का ध्यान करते.जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये.भगवान् कृष्णा  राष्ट्र  को सम्पन्नता प्रदान करे.

jlsingh के द्वारा
August 28, 2016

आदरणीया डॉ. शोभा जी, सादर अभिननदन! मैंने आपके अनेकों आलेख पढ़े सबमे अजीब प्रवाह रहता है, पर इस आलेख ने तो जैसे चमत्कृत कर दिया. कुछ ही शब्दों में कुछ ही पलों में महाभारत का हर सीन जैसे आँखों के सामने घूम गया और तुरंत कथा समाप्त! सत्यनारायण भगवान की कथा जब संस्कृत में पंडित जी पाठ करते हैं तो वह भी बहुत जल्द समाप्त हो जाता है, पर कुछ समझ में नहीं आता… पर यहाँ तो ऐसा लगा सबकुछ आँखों के सामने घटित हो रहा है! अजीब चमत्कार है आपकी लेखनी में, आपकी वाणी भी ऐसी ही होंगी…. बिना कुछ देखें बोलती जाती होंगी, सुननेवाला मंत्रमुघ्ध ….और क्या कहूँ बस! सादर अभिनन्दन !

harirawat के द्वारा
August 28, 2016

शोभाजी नमस्कार, उच्चकोटि के लेखक के अलावा, धार्मिक ग्रंथो पर भी आपकी मजबूत पकड़ है ! साधुवाद ! कुरुक्षेत्र में युद्ध शुरू होने से पहले दोनों पक्षों में एक समझौता हुआ था की, पैदल पैदल, हाथी घोड़े वाले के साथ हाथी घोड़े वाला, तलवार वाले के साथ, तलवार और धनुषवाण वाले के साथ केवल धनुषवाण वाला ही लड़ेगा ! निहत्थे पर वार नहीं किया जाएगा, न अकेले पर दो तीन मिलकर आक्रमण करेंगे ! जब तक भीष्म पिता रहे तब तक सब नियमों का पालन होता रहा, लेकिन उनके बाणों की शैया पर लेटते ही पासा पलट गया, १६ साल के अभिमन्यु को निशस्त्र करके सात महारथियों ने, कर्ण, दर्योधन, दुशासन, द्रोणाचार्य, अश्वस्थामा, कृपाचार्य, जयदर्थ ने मिलकर बड़ी निर्दयता से मारा अभिमन्यु के मुंह से निकले, मैथिलि शरणगुप्त की कविता “मामा तथा निज तात इस समय तुम हो कहीं, अभिमन्यु का इस भांति मरना भूल मत जाना कहीं” ! इसके बाद सारे नियम धूलधूश्रित होगये ! जैसे जिसने दुष्कर्म किये उन्हें उनका फल दिया गया श्री कृष्ण भगवान् की इच्छा से !

meenakshi के द्वारा
August 29, 2016

शोभा जी सादर अभिवादन ! आपका प्रस्तुत ब्लॉग “श्री कृष्ण नीति ” पढ़कर लगा मानो माहाभारत सीरियल प्रोग्राम अर्थात चलचित्र देख रही हूं . अति सुन्दर और सामंजस्य है,आपके लेखन पर … शुभकामनाएं !

Pravin Kumar के द्वारा
August 29, 2016

नीति अपमान अन्याय अपराध दंड प्रायश्चित पुरस्कार की न्यायपूर्ण कथा है महाभारत और आपने इस विशाल कथा को शब्दो में संक्षेप अवश्य किये किन्तु पूरा वृत्तान्त भी आँखों में घूम गया और पुरे महाभारत मूल सेंट्रल आईडिया इससे बढ़िया आज तक नहीं पढ़ा, आपके लेखनी में मां सरस्वती का निश्चय ही आशीर्वाद है

Rajesh Dubey के द्वारा
August 29, 2016

कृष्ण की नीति आज भी प्रासंगिक है. घर-घर में गीता इसकी सार्थकता को बताता है. सुंदर लेख वधाई.

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

श्री रमेश जी आपको श्री कृष्ण का कूटनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ रूप पर लिखा के लेख पसन्द आया धन्यवाद उनका उद्देश्य ही धर्म की स्थापना करना था उनका राजतन्त्र सर्व जन हिताय और सुखाय था |

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

श्री रमेश जी आपको भगवान श्री का राजनीतिक और कुटनीतिक रूप पसंद आया धन्यवाद उनकी नीति धर्म की रक्षा पर आधारित थी |

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

श्री जवाहर जी हम सब में आस्थावान है जब भी भगवान श्री कृष्ण के किसी चरित्र का वर्णन किया जाता है हमारी आस्था प्रबल हो जाती है हम उसी नजर से पढ़ते हैं उनका अवतार ही धर्म की स्थापना के लिए हुआ था |इसलिए आपको पसंद आया धन्यवाद

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

श्री रावत जी मेरे ननिहाल में हमारे मन्दिर में भगवान श्री कृष्ण और राधा की युगल मूर्ति विराजती है बचपन में मैं अपनी नानी को श्री मद्भागवत सुनाया करती थी आज उन्हीं प्रसंगों को मैने अपनी समझ से भगवान का राजनीतिकऔर कुटनीतिक रूप में लिखा है जो गीता में भगवान ने कहा है इन्सान के मन में उठने वाले हर प्रश्न का उत्तर है |लेख पढने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

प्रिय मीनाक्षी जी आपको मेरा लेख पसंद आया अतिशय धन्यवाद मुझे महाभारत प्रसंग में जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था और जैसा कौरवों के कृत्य का राजनीतिक उत्तर की वह अपेक्षा करते थे श्री कृष्ण ने अपनी नीति से दिया आने वाले समाज के लिए सबक है जब किसी विषय को दुःख से लिखा जाता है वह सजीव हो जाता है पसंद करने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

प्रिय प्रवीन आपने लेख पढ़ा पसंद आया धन्यवाद यह महाभारत का दुखद प्रसंग है जो भी पढ़ता है उसके मन में अन्याय के प्रति दुःख होता है लिखना भी मैने सबके लेख पढ़ कर ही सीखा है पहले मुझे भाषण देने का शौक था |

Shobha के द्वारा
August 30, 2016

श्री राजिव जी सही लिखा है आपने गीता को हर घर में समझा जाता है अन्याय का विरोध धर्म की की रक्षा मूल उद्देश्य है |

Anil bhagi के द्वारा
August 31, 2016

भगवान श्री कृष्ण को सोलह कला सम्पूर्ण माना जाता है उन्होंने संसार को नया संदेश दिया कभी भी आततायी को दंड दिए बिना मत छोड़ों उन्होंने अपने मौसेरे भाई द्वारा बोले गये अपशब्दों को सौ बार बर्दाश्त किया लेकिन उसके बाद उसे मृत्यु दंड दिया

Shobha के द्वारा
August 31, 2016

श्री अनिल जी अति सुंदर भाव पूर्ण प्रतिक्रिया ऐसे ही महाभारत से पूर्व शांति दूत बन कर धृतराष्ट्र के दरबार में समझाने गये थे | अंत में केवल पाँच गाँवो पर समझौता करने को तैयार थे जिसे दुर्योद्धन ने पांडवों की कमजोरी समझा था

nishamittal के द्वारा
September 4, 2016

जय राधे कृष्ण  कूटनीतिज्ञ कृष्ण पर धर्म के और सत्य के पक्ष में ,सुंदर जानकारी शोभा जी

Shobha के द्वारा
September 6, 2016

प्रिय निशा जी मुझे श्री कृष्ण का यही रूप प्रिय है लेख पढने के लिए धन्यवाद


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