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हिंदी भाषा सशक्त भाषा है |

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हिंदी भाषा सशक्त भाषा है |हिंदी दिवस पर मैं अपनी बात लिखना चाहूंगी | मेरे कालेज में नोटिस लगा था प्रादेशिक भाषा में चलने वाली कहावतें लोकोक्तियाँ लुप्त होती जा रहीं हैं उनका संग्रह करने वालों के लिए तीन इनामों की  घोषणा की गयी थी| पूजा पाठ के लिए ब्राह्मणों की जरूरत रहती है इसलिए अलग -अलग प्रदेशों से पंडित माईग्रेट करते या बुलाये जाते हैं | मेरा ननिहाल पंजाब का हैं नाना कर्नाटकी जोशी ब्राह्मण थे | दादी जी के पिता मुरादाबाद से पंजाब गये थे मेरी दादी जी बात-बात- पर चंद लाईने बोलती रहती थीं जिनमें सीख होती थी जैसे ‘खिचड़ी तेरे चार यार घी पापड़ दहीं अचार’ | मुझे अब दादी जी की जरूरत थी मैं उनकी शरण में गयी उन्होंने भी बहुत खुशामद करवाई मेरे सिर में तेल लगा कर उँगलियों से मालिश कर कमर दबा हर वक्त मैं दादी जी की सेवा में हाजिर रहती थी |उन्होंने कई कवित्त याद कर लिखवाये | पिताजी की पहली पोस्टिंग इलाहाबाद की थी उनसे भी मदद ली कुछ आज भी याद हैं जैसे ‘अहीर धौं-धों खाऊँ कि रोंदों’ कई तो जातियों पर कटाक्ष थे | हैरानी की बात हैं मुझे द्वितीय पुरूस्कार के लिए चुना गया हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ अग्रवाल 16 भाषाओं के माहिर थे वह अनेक भाषों में लिखते भी थे |प्राईज डिस्ट्रीब्यूष्ण समारोह के भाषण में उन्होंने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा मुझे आश्चर्य हुआ एक हिंदी भाषी लड़की का पंजाबी पर इतना अधिकार मैने उत्तर दिया सर मेरी माँ और पिता पंजाब के हैं बचपन इलाहाबाद में बिता है परन्तु इंटर मीडिएट तक बंगला स्कूल में पढ़ी हूँ उन्होंने आश्चर्य से कहा तुम्हें वाद विवाद प्रतियोगिताओं में बोलते सुना है परन्तु न तुम्हारा लहजा पंजाबी है न पंजाबी के किसी भी शब्द का उच्चारण सुना |उनका अगला सवाल बंगाली में था क्या बंगला समझती हो मैने बंगला लहजे में कहा ओलप – ओलप| बंगालियों की बिशेषता हैं कितने भी परिचितों मे बैठे बातें कर रहे हों जैसे ही दो बंगाली मिलते हैं आस पास के लोगों को भूल कर बंगला में बात करते हैं आप मूर्खों की तरह उनका मुहँ देखते रह जाते हो | मैने उन्हें बताया पिता बेहतरीन उर्दू बोलते हैं गजल और लेख लिखते हैं दो उर्दू अखबारों में उनका कालम है हमारे घर में खालिस उर्दू मिश्रित हिंदी बोली जाती है |

मेरा विवाह मथुरा के परिवार में हुआ घर में बृजभाषा बोलते हैं ऐसी मीठी उदाहरण – माई री माई सांकरी गली में कंकड़ी गड़तु है |जैसे ही मथुरा जंगशन पर मेरे पति उतरते हैं खालिस अंदाज से बृज बोलना शुरू कर देते हैं  वैसे दिल्ली में हिंदी या अंग्रेजी में बात करते हैं | शादी के कुछ ही वर्ष बाद मेरे पति की ईरान के खुर्दिस्तान में पोस्टिंग हुई यहाँ दो भाषाओं से राबता पड़ा फ़ारसी और खुर्दी |फ़ारसी भाषा के बोलने का लहजा बहुत खूबसूरत और मीठा हैं ख़ास कर जब ईरानी खानम बोलती हैं उसमें शहद जैसी मिठास और चेहरे की भंगिमा अद्भुत होती है |दूसरा  खुर्द, खुर्दी भाषा बोलते हैं उन्हें अपनी भाषा पर बहुत गर्व हैं खुर्दिस्तान में पैदा हर चीज को वह महलली कहते हैं मजेदार बात यह है ईरान में बेहतरीन फार्मी गेहूं का आटा मिलता था उनका वहाँ पैदा होने वाला लाल गेहूं अच्छा नहीं था लेकिन बड़े गर्व से कहते थे हमारे महलली आटे का नान पकता है उसकी दूर-दूर तक खुशबु उड़ती है | खुर्दी भाषा में कई हिंदी के शब्द मिलते थे जैसे दूध को क्षीर भूख के लिए गुर्शने प्यास त्रिष्ने उलटी कै और  अनेको शब्द | कोशिश करनी ही नहीं पड़ी न जाने कब फ़ारसी और खुर्दी सीख ली वहाँ के मिलने वाले ईरानी कहते पूछते  फ़ारसी मीदानी( जानते हो )  खुर्दी भी यही कहते खुर्दी वलदई (जानते हो ) मैं कहती बले खुर्दी फ़ारसी काती पाती( खुर्दी और फ़ारसी मिली जुली ) नमी दूनम कुजा खुर्दी कुदाम फ़ारसी ( यह समझ नहीं आता कहाँ फ़ारसी है कहाँ खुर्दी )परन्तु बच्चों की दोनों भाषाओं में महारथ थी वह खुर्दी लहजे में बात करते थे|

विदेशों में पाकिस्तानी और भारतियों के मधुर सम्बन्ध बनते हैं |यह सम्बन्ध संस्कृति खान पान  और भाषा से जुड़ता है| हमारे आसपास पंजाब के रहने वाले पाकिस्तानी थे जैसे उन्हें पता चलता मैं पंजाबी जानती हूँ दो क्षण में  भाभी से बहन का सम्बोधन करने लगते कहते अपनी पंजाबी में मुहँ भर- भर कर बात होती हैं कई डाक्टर कहते अरे अपने बच्चों को मदर टंग पंजाबी नहीं सिखाई मैं हंसती थी न मदर टंग पंजाबी न फादर टंग बृज | कई तो अटपटा प्रश्न करते बहन तुम्हारे माता पिता को तुम्हारी शादी के लिए भईया ही मिला था |वहाँ आज भी भारत से गये उर्दू भाषी मुहाजरो को भईया बोलते हैं | मैं उन्हें कहती भईया बहुत अच्छा है वह आशीर्वाद देते दोनों की जोड़ी सलामत रहे | पठान पश्तो बोलते हैं वह फ़ारसी के करीब थी | वह स्वाभाविक रूप से हममे घुल मिल जाते |

ईरान में कई महिलाएं फ़ारसी और अरबी पढ़ना नहीं जानती थीं उनकी विशेष क्लास लगाई गयी दानिश आमुजिशी वहाँ पहली दानिश्जू ( छात्रा ) मैं थी उन्हें अरबी भाषा का ज्ञान कुरआन पढ़ने के लिए दिया जा रहा था | मेरे लिए फ़ारसी और अरबी लिखने पढ़ने का सुनहरा अवसर था| हमारी उस्ताद बड़ी प्यारी खूबसूरत खुर्दी लड़की थी नाम था जन्दी मैं उसको देखती रह जाती थी उसने मुझे फ़ारसी के अक्षर सिखाये उन अक्षरों को जोड़ कर लिखना सिखाया फ़ारसी में खूबसूरती से अक्षर लिखना एक कला है | जब अरबी सीखनी शुरू की समझ में आया अरबी में फ़ारसी से पांच नुक्ते अधिक है वही हमारे यहाँ मात्राएँ हैं| कभी- कभी तेहरान से इंस्पेक्टर आते उनको खुर्दियों के बीच में हिंदी खानम पहले अजीब लगती थी वह टूटी फूटी अंग्रेजी जानते थे उन्होंने मुझसे पूछा आपके देश हिन्द की अपनी भाषा समृद्ध है फिर हिंदियों की संस्कृत जुबान खुदाई जुबान ( देववाणी )है मैने उनको समझाया फ़ारसी ने हिन्द पर राज किया है दरबारी भाषा रही है | अंग्रजों का अभी राज शुरू नहीं हुआ था फ़ारसी भाषा का प्रयोग दरबारी कामों ,लेखन की भाषा के रूप में होता था दरबारों में प्रयोग होने के कारण अफगानिस्तान में इसे दारी भी कहते हैं | हमारे यहाँ कई स्टूडेंट फ़ारसी पढ़ते हैं| दिल्ली यूनिवर्सिटी में फ़ारसी की डिक्शनरी को और डवलप किया जा रहा है|  उन्होंने बताया पर्शियन ग्रामर संस्कृत से ली गयी है कई संस्कृत के शब्दों का प्रयोग फ़ारसी में किया जाता है यही नहीं प्राचीन संस्कृत और ईरानी अवस्ताई दोनों बहने थीं | मैने उन्हें बताया हमारी ऊर्दू का विकास अरबी फ़ारसी से हुआ यह नस्तालीक लिपि में लिखी जाती है| इसे अरबी फ़ारसी लिपि की तरह  दायें से बायीं ओर लिखते हैं | भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि से पर्शियन अरबी से बहुत भिन्न है लेकिन संस्कृत के पास है संस्कृत और फ़ारसी में हजारों शब्द मिलते हैं जो दोनों भाषों की सांझी धरोहर हैं |यही नहीं अनेक संस्कृत की कहानियों का अनुवाद पर्शियन में हुआ है| ईरान में सफवी वंश का शासन था भारत में मुगल साम्राज्य फल फूल रहा था वह साहित्य के आश्रयदाता थे धन की कोई कमी नहीं थी अत :अनेक पर्शियन विद्वान अपना देश छोड़ कर भारत में बस गये |

भारत आने के बाद घर में बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते थे अंग्रेजी का चलन बढ़ गया | लेक्चर देने में मुश्किल नहीं आई जब मैने लिखना शुरू किया मुश्किलें आयीं कई बार फ़ारसी शब्द इतना हावी हो जाता उनके लिए हिंदी में शब्द ही नहीं मिलता कभी अंग्रेजी हावी हो जाती परन्तु हमारी हिंदी की विशेषता है वह हर भाषा को ग्राह्य कर समृद्ध भाषा है जो बोली जाती है वहीं लिखी जाती है |भारत के माथे की बिंदिया है लेकिन राज्य भाषा बन कर रह गयी है |

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
September 17, 2016

जय श्री राम शोभा जी आपके अनुभव बहुत अच्छे लगे ये देश का दुर्भाग्य की हिंदी इतनी विकसित होते हुये भी राष्ट्र भाषा नहीं बन पाई हिंदी बोलने वाले प्रदेशो में पब्लिक स्कूल की वजह से घर में बच्चे हिंदी बोलने में शरमाते.हमतो व्हाट्सएप्प में भी हिंदी में लिखते छाए लोग बुरा मने.हम लोग अभी भी अंग्रेजो की रह पर चल रहे और मानसिकता तक नहीं बदली हिंदी बिलने वालो को पिछला समझते.नाईजेरिया में भी केरल के बहुत लोग थे उनके साथ भी यही समस्या थी की आपस में मलयाली में बात शुरू कर देते.हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं हम हिंदी बोलने वाले दोषी है.

jlsingh के द्वारा
September 17, 2016

हमारी हिंदी की विशेषता है वह हर भाषा को ग्राह्य कर समृद्ध भाषा है जो बोली जाती है वहीं लिखी जाती है |भारत के माथे की बिंदिया है लेकिन राज्य भाषा बन कर रह गयी है | आपने बिकुल सही कहा आदरनीया. वैसे आपका भाषा ज्ञान और सामान्य ज्ञान अजीब है …आश्चर्य होता है आप कितनी प्रतिभावान हैं. शायद गाय के दूध का ही असर है. धन्य हैं आप और धन्य हैं हमलोग अब हमलोगों के बीच प्रतिक्रियाओं का आदान प्रदान चलता रहेगा. उम्मीद है जागरण जंक्शन की तकनीकी टीम आगे से ख्याल रक्खेगी! सादर!

Shobha के द्वारा
September 17, 2016

श्री रमेश जी मुझे बेहद दुःख होता है मेरे बच्चे हिंदी को अंग्रेजी में लिखते है उन्हें हिंदी ऐसे लगती है जैसे किसी और प्लैनेट की भाषा है जबकि पब्लिक स्कूलों में पढ़ा कर हम बच्चों को अपने से दूर कर लेते हैं लेख पढने के लिए अतिशय धन्यवाद

Jitendra Mathur के द्वारा
September 17, 2016

आपके संस्मरणों से ओतप्रोत बहुत ही मनोरंजक, प्रेरक एवं प्रशंसनीय आलेख है यह शोभा जी । आभार एवं साधुवाद ।

Shobha के द्वारा
September 17, 2016

श्री आदरणीय रमेश जी सही लिखा है आपने हिंदी के प्रति आज के बच्चे उदासीन हैं अंग्रेजी से रोजगार जुड़ गया है हैरानी की बात तो यह हैं हिंदी भी क्या हिंग्रेजी बोलते हैं लेख पढने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
September 17, 2016

श्री जवाहर जी बहुत समय वाद प्रतिक्रियाये पढने को मिली यह आपकी मेहनत का फल है जवाहर जी मेरा घर आलोचकों का डेरा है मैं अपने लेखों को फेस बुक पर डालती हूँ क्योकि मेरी बेटी विदेश में है लेख पढ़ते ही वह उसमें कमियां निकालती है रही सही कसर मेरे पति निकालते है मेरा एक लडका मुम्बई में रहता है उसे हिंदी पढनी नहीं आती वह वैसे ही like कर देता है लेकिन फोन पर कमेंट करता है मोम तुम्हारा लेख सुपरफिशियल सा लगा आपलोग पसंद करते हैं मैं खुश हो जाती हूँ जवाहर जी मैं काम की बातों को दिमाग में ठोक लेती हूँ जो मतलब का नहीं है सुनती ही नहीं हूँ मैमोरी बढाने का तरीका रहा है |

Shobha के द्वारा
September 17, 2016

श्री जितेन्द्र जी काफी समय बाद सबको अपने ब्लॉग पर देखा बहुत अच्छा लगा मैं तो प्रतिक्रिया न जाने पर निराश हो गयी थी आपको लेख पसंद आया धन्यवाद

abhijat के द्वारा
September 18, 2016

परिवार में अंग्रेजी पर जोर दिया जाता था मुझे अफ़सोस है मेरी हिंदी लिखने में अच्छी नहीं है पहले में अंग्रेजी में ही सोचता था परन्तु अब जानता हूँ हमारी भाषा कितनी रिच है हिंदी सुधारने की कोशिश कर रहा हूँ

achyutamkeshvam के द्वारा
September 19, 2016

ज्ञानवर्धक,स्वानुभूतिपरक सुन्दर आलेख , शुभकामनाएं

Shobha के द्वारा
September 19, 2016

श्री अच्युत जी अति सुंदर प्रतिक्रिया

Shobha के द्वारा
September 19, 2016

असल में अंग्रेजी को अच्छी नौकरी मिलने का रास्ता मान लिया जाता है इस लिए माता पिता अपनी सारी पूंजी लगा कर भी महंगे स्कूलों में पढाते हैं जबकि हिदी बहुत अच्छी भाषा है

jlsingh के द्वारा
September 21, 2016

साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई आदरणीया ! बहुत खुशी हुई आपको बेस्ट ब्लोगर के रूप में चयनित होने पर! आपका बहुत बहुत अभिनन्दन!

Shobha के द्वारा
September 21, 2016

श्री जवाहर जी आप लोग मेरे लेख पढ़ते हैं प्रतिक्रिया देते हैं यही मेरे लिए बहुत है उससे मैं अधिक सम्मानित महसूस करती हूँ मेरा सिर चार इंच ऊंचा हो जाता है

sadguruji के द्वारा
September 21, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! अतिसुन्दर और अनुभव से परिपूर्ण आलेख ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने पर हार्दिक अभिनन्दन और बहुत बहुत बधाई ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
September 21, 2016

बहुत अद्भुत माता श्री ! हिन्दी को अस्तित्व में रखने के लिए आप जैसे कलमकारों की ज़रूरत हैं !

sinsera के द्वारा
September 21, 2016

शोभा जी नमस्कार, आपके लेख पढ़ कर मज़ा आ जाता है. वसुधैव कुटुम्बकम को आप पूरी तरह सार्थक करती हैं. कितना आत्मिक संतोष मिलता होगा आपको. अगर हिन्दू-मुस्लिम, छुआ-छूत, भेद-भाव ..इन्ही सब में उलझ जातीं तो आज न तो हम लोग ये कीमती संस्मरण पढ़ पाते न ही आपके पास ज्ञान का इतना “अकूत” भंडार होता..अकूत शायद फारसी का शब्द है..?

Shobha के द्वारा
September 22, 2016

प्रिय सरिता जी आपकी प्रतिक्रिया ने मुझे मचान पर चढा दिया यह सही बात है मुझे अनेक भाषाओं को जानने का मौका मिला दूसरा कई देशों में जाने का अवसर भी मिला आपकी बेटी की तरह मुझे भी भगवान ने बेटी रत्न दिया है वह विदेश में है परन्तु योरोप में अपने काम के सिलसिले में जाती है वह मेरे हर लेख की क्रिटिक है |मैं सबमें बहुत जल्दी घुल मिल जाती हूँ लेकिन जैसी परिष्कृत भाषा आप लिखती हैं मैं नहीं लिख सकती मुझे अनेक भाषाओं के शब्द तंग करते हैं ग्रामर में भी मुश्किल पडती है मेरे पिता की मृत्यु जल्दी हो गयी थी वह लिखते थे अचानक मैने और मेरी दो बहनों ने भी लिखना शुरू कर दिया एक वहन अंग्रेजी में लिखती है एक जानी मानी व्यंगकार है में आपके सामने हूँ मेरे पिता छोटी सी बात को नाटकीय बना देते थे लेख पढने पसंद करने के लिए धन्यवाद अकूत शायद उर्दू का शव्द है |

Shobha के द्वारा
September 22, 2016

प्रिय जितेन्द जिस दिन तुम्हारी तरह एक भी कविता लिख लुंगी कलम कार बन जाउंगी लेख पढने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
September 22, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी मैने अंतर्राष्ट्रीय नीति सम्बन्धों पर बड़ी मेहनत से लेख लिखे | हाँ भाषण भी दिए खूब तालियाँ बजीं परन्तु मेरा एक भी लेख मुझे बेस्ट ब्लागर आफ दा वीक नहीं बना सका परन्तु मैने यह लेख ऐसे ही अपने अनुभवों के आधार पर लिख दिया वह पसंद आया राजेन्द्र जी आप सब मेरा लेख पढ़ कर प्रतिक्रिया देते हैं या मैं अच्छा लेख पढ़ कर प्रशंसा करती हूँ वह मुझे अधिक ख़ुशी संतोष देते हैं या मेरे आलोचक बच्चे कमियां निकालते हैं अच्छा लगता है | आपने लेख पढ़ा पसंद किया धन्यवाद

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
September 25, 2016

आदरणीय शोभा जी ,केवल पाॅच मिनट और आधी दुनिया ऱोचकता से घुम लिया ।हिंन्दी साहित्य का विकास कैसे हुआ होगा । यह आपका लेख सिद्रध करता है । थोडा सा सुधार मैं करना चाहुॅगा ,कि हिन्दी को हिन्दुस्तान की राजभाषा का दर्जा दिया गया है ना कि राज्य भाषा । ऱाज और ऱाज्य मैं अंतर है। ओम शांति शांति कारक ज्ञान आभार

Shobha के द्वारा
September 26, 2016

श्री हरीश जी लेख पढने के लिए धन्यवाद यह लेख पूरी तरह से मेरे संसमरण थे आपको रोचक लगे धन्यवाद हाँ भूल हुई हिंदी राजभाषा है |धन्यवाद

ashasahay के द्वारा
September 27, 2016

कुछ विलम्ब मुझसे अवश्य हुआ है किन्तु बेस्ट बलॉगर आफ वीक के लिए बहुत बहुत बधाई।नमस्कार डॉ शोभा जी। आपका आलेख आपके स्वयं के अनुभवों से पुष्ट होकर बहुत सुन्दर तरीके से हिन्दी भाषा की उदार सर्वग्राह्यता पर प्रकाश डालता है।पुनः बधाई।

Shobha के द्वारा
September 28, 2016

प्रिय आदरणीय आशा जी मेने आपके हर लेख पढ़े थे लेकिन प्रतिक्रिया नहीं जा रही थी जवाहर जी और रमेश जी के प्रयत्नों से हम फिर आपस में बात कर सके हैं | मुझे हंसी आती है मेने यह लेख वैसे ही अपने अनुभव से लिखा था आप सब ने पढ़ा मेरे लिए खुशी की बात हैं मैं भी हिंदी साहित्य की लेखक बन गयी मेरी गर्दन चार इंच ऊंची हो गयी

Rajesh Dubey के द्वारा
September 29, 2016

बहुत सुन्दर, कहावतें अब बात बात पर कहने की परंपरा ख़त्म हो रही है. पुराने लोग कहावतों का इस्तेमाल बोलचाल में करते रहते है.

Shobha के द्वारा
September 29, 2016

सही है राजिव जी आज की हिंग्रेजी जेनरेशन को पता ही नहीं है कहावतें क्या हैं लेख पढने के लिए धन्यवाद


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