Vichar Manthan

Mere vicharon ka sangrah

219 Posts

2960 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 15986 postid : 1266777

सत्ता से ऊपर धर्म मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

Posted On: 4 Oct, 2016 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

भगवान श्री कृष्ण की राजनीति धर्म स्थापना के सिद्धांत पर आधारित थी बाद के अनेक कूटनीतिज्ञयों ने राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत को मानते हुये मजबूत राजतन्त्र का समर्थन किया जिनमें अरस्तु और चाणक्य का ईसा से पूर्व का दर्शन हैं| 1531 में प्रकाशित मैकयावली की पुस्तक दा प्रिंस में नवोदित राजा कैसे अपनी सत्ता की पकड़ मजबूत करें के सुझाव थे | विश्व के इतिहास में न किसी ने देखा न सुना न कि ऐसा भी राज्य हो सकता है जहाँ सत्ता की पकड़ मजबूत करने के स्थान पर सिंहासन खाली था जिसका अधिकार था वह पिता के दिये बचनों को पूरा करने राजतिलक के दिन तापस वेश धारण कर श्री राम ने वन गमन किया भरत जिसको राज्य मिला उसे सत्ता की चाह ही नहीं थी उसने अन्याय का प्रतिकार किया |अपने ज्येष्ठ भ्राता को लेने सिंहासन और समस्त प्रजा के साथ वन में गये | सत्ता से ऊपर दोनों भाईयों के लिए धर्म मुख्य था| ऐसा भारत भूमि में महान प्रतापी राजा दशरथ की अयोद्धया में हुआ |स्वर्ण सिहासन पर श्री राम की खड़ाऊँ 14 वर्ष तक विराजमान रहीं उन पर स्वर्ण से जड़ा सफेद सिल्क का छत्र तना था| खड़ाऊँ के नाम का डंका बजा और दोनों भाई भरत शत्रुघ्न तपस्वियों का वेश धारण कर सख्त जीवन जीने का व्रत ले कर सिंहासन के चरणों में बैठ गये| भरत नंदीग्राम में रह कर राम के नाम पर उन्हीं की तरह जीवन बिताते राज्य चला रहे थे |उन्होंने अपनी जननी का भी त्याग कर दिया | प्रतिदिन मंत्री, सभासद और सेना प्रमुख दरबार में उपस्थित होते श्री राम की खड़ाऊँ के सामने सिर झुका कर सम्मान देते थे | पवित्र पावन अयोद्धया में कई दिन तक बादल सूर्य को ढके रहे ऐसा लगता था जैसे चारों और दुःख पसरा हों न गीत न संगीत  ऋतुएं आती थी चली जाती थी| पर्व भी आते थे चले जाते थे न हर्ष न उल्लास केवल उदासी थी जैसे उनके राजा राम वन में रहते थे इसी तरह सम्पूर्ण प्रजा जीवन बिता रही थी उन्हें इंतजार था उस घड़ी का जब 14 वर्ष समाप्त होंगे राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपनी नगरी में लौटेंगे|

महाराज दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के राज्याभिषेक का निश्चय किया सब और उल्लास था लेकिन कैकयी के मायके से आई दासी मंथरा को शांति नहीं थी वह महारानी के कक्ष में गयी बताया कल राम का राज तिलक है रानी आनन्दित हुई उसे पुरूस्कार देने लगी मंथरा ने उसे धरती पर फेक दिया| कैकयी मंथरा के कुटिल स्वभाव को जानती थी उसने क्रोध से कहा यदि मेरे आनन्द से आनन्दित नहीं हो सकती तो चुप ही रहो तू राम को नहीं जानती है उस जैसा प्रिय पुत्र नहीं हो सकता | मंथरा बोली भरत के पास संदेश भिजवाओ कभी ननिहाल से न लौटे तुम्हारे भी दिन फिरने वाले हैं राम राजा होगा उसकी माता राजमाता तुम उसकी सेविका |केकयी के मर्म पर चोट करते हुए कहा तुम और भरत यदि सेवक और सेविका बन कर रहोगे तभी चैन से जी सकोगी| रानी भयभीत हो गयी मंथरा की दुर्बुद्धि उस पर हावी हो गयी मंथरा ने कैकई को याद दिलाया तुम महाराज की तीसरी रानी हो महाराज के कोई सन्तान नहीं थी उन्होंने विवाह के समय तुम्हारे पिता को तुम से उत्पन्न पुत्र को राजसत्ता सौंपने का आश्वासन दिया था| धीरे –धीरे रानी मंथरा की बातों में आ गयी उसने रानी को याद दिलाया देवासुर संग्राम में तुमने रथ संचालन करते हुए राजा दशरथ के प्राण बचाए थे कृतज्ञ राजा ने तुम्हें दो वरदान मांगने के लिए कहा था आज यह सुअवसर आया है तुम राजा से अपने बरदान मांग कर अपने और भरत के अधिकारों की रक्षा कर सकती हो | जाओ कोप भवन में जा कर महाराज के आगमन की प्रतीक्षा करो एक बात याद रखना जब तक महाराज राम की सौगंध न खायें तब तक वरदान नहीं मांगना |रानी कोप भवन में चली गयी उसके केश बिखरे हुए थे वह नागिन की तरह फुंकार रही थी|  महाराज ने महल में प्रवेश किया हर तरफ शोक और संताप था रानी कहाँ थी ?मंथरा ने कोपभवन का मार्ग दिखा दिया महाराज आशंकित हुए ठिठके ,प्रिय रानी से क्रोध का कारण पूछा रानी ने महाराज को उनके दिए वरदानों की याद दिलाई| महारानी के षड्यंत्रकारी मन को न समझ कर राजा ने दोनों वर मांगने के लिए कहा यही नहीं राम की सौगंध भी खायी रानी के दो बचन क्या थे? तरकश से निकले दो विषैले तीर ,भरत को राज्य राम को तपस्वी वेश में 14 वर्ष का बनवास |असहाय बचनबद्ध राजा को रानी अजनबी लगी वह व्यथित हो उठे रानी को समझाया तुम अपने लिए वर नहीं वैधव्य मांग रही हो मैं यह अन्याय सह नहीं सकता परन्तु सब बेकार था |सुबह हो गयी महल में कहीं हलचल नहीं थी कारण जानने के लिए राजा के महामंत्री सुमंत महल में गये राजा की हालत देख कर कारण पूछने पर हैरान रह गये उन्होंने रानी की कुटिलता पर दंड देने को कहा बचनबद्ध राजा ने राम को बुलावा भेजा गया| राम ने पिता को व्यथित देखा कैकई द्वारा कारण जानने पर पिता के बचनों की रक्षा के लिए तुरंत वन जाने का निश्चय किया| निरपराध राम को बनवास ,उनके साथ पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण ने भी वन जाना अपना धर्म समझा| राज महल के बाहर सभासदों प्रमुख प्रबुद्ध जनों और जनसमाज की भीड़ बढ़ने लगी | राम और लक्ष्मण समस्त राजचिन्ह त्याग कर तपस्वियों के  वेश में राजमहल से बाहर आये साथ में राजसी वस्त्रों में राजलक्ष्मी सुकुमारी सीता भी थी |ऋषि वशिष्ठ ने सहारे से सीता को रथ पर चढाया राम को अपनी युद्ध विद्या का निरंतर अभ्यास करते रहने का परामर्श दिया | सुमंत ने हवा के वेग से चलने वाले घोड़ों को चाबुक से इशारा किया घोड़े अगले पंजों को ऊपर उठा कर हिनहिनाये वेग से सरपट भागने लगे | राजा को होश आया, बालकनी पर आकर चीत्कार कर उठे ठहरो-ठहरो लेकिन रथ महल का दरवाजा पार कर चुका था सेवकों ने द्वार बंद करने की कोशिश की लेकिन नाकाम हो गये महल के मुख्य द्वार पर आक्रोशित जन समूह खड़ा था हर निवासी अन्याय के खिलाफ अयोद्धया छोड़ने के लिए आतुर महाराज को दिए बचनों की रक्षा कैसे की जाए क्षुब्ध महामंत्री ने हवा में चाबुक लहराया विशाल भीड़ के मध्य से रथ को निकाल लिया | रथ ने पहले विशाल राजमार्ग पार किया धीर-धीरे मार्ग पतला होता गया कच्चे मार्ग से चलता रथ तमसा के तट पर रुका राजप्रसाद ,नगरी पीछे रह गयी लेकिन विशाल जनसमूह भी पीछा करते आ पहुँचा यह जनता का रानी के अन्याय के विरुद्ध जन आक्रोश था |

‘राम राम कहि राम कहिराम राम कहि राम |तनु परिहरी रघुबर विरह राऊ गयउ सुरधाम ||’ राजा ने प्राण त्याग दिये पिता की अन्तेष्ठी के बाद भरत ने सिंहासन स्वीकार नहीं किया उनका मन माता के कुकृत्य पर ग्लानी से भरा था | उन्होंने वन जा कर श्री राम को वापिस अयोद्धया लाने का निश्चय किया सभी नगरवासी , मातायें और गुरुजन साथ थे | वन में सभा बैठी भरत ने राम से आग्रह किया वह अपनी नगरी में लौट कर राज्य सम्भालें उनके स्थान पर वह पिता के बचनों की पूर्ति के लिए बन में रहेंगे| माता कैकयी पश्चाताप और ग्लानी से झुकी हुयीं थी जिसने बरदान मांगा अब उसे कुछ नहीं चाहिए था जिसके लिए राज्य माँगा उसे स्वीकार नहीं था |वह राम से लौटने का आग्रह कर रही थी| लेकिन पिता नहीं थे भरत के बार-बार आग्रह पर भी राम नहीं माने अंत में भरत ने कहा मैं नहीं आपकी खडाऊ सिंहासन पर बिराजेगी यदि 14 वर्ष के बीतने पर एक दिन भी ऊपर हुआ वह अग्नि में प्रवेश कर लेंगे |

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

L.S.Bisht के द्वारा
October 4, 2016

आदरणीय शोभा जी आपका ताजा तरीन लेख पढा । अच्छा लगा । आपकी धार्मिक विषयों पर भी अच्छी जानकारी है । आपके लेखों से कुछ न कुछ नई जानकारियां मिलती रहती हैं । इसी तरह लिख कर हम ब्लागर मित्रों का ज्ञानवर्धन करती रहें । सादर्

Shobha के द्वारा
October 4, 2016

श्री बिष्ट जी अगर थोड़ा ज्यादा नहीं पढ़ती तो कथा वाचक होती पंडिताई करती आपने लेख पढ़ा अतिशय धन्यवाद

rameshagarwal के द्वारा
October 5, 2016

जय श्री राम शोभा जी आपने जिस दिलचस्प शैली में राम भारत का चित्रण किया बहुत ही दिल को छूने वाला आजकल स्टार प्लस में सिया के राम सिरियाक रात ८ बजे से आता है बहुत अच्छा है परिवार बहुत दिलचस्पी से देखता.भरतजी की सिंघासन पर खड़ाहु रख कर राज्य करना ट्रस्ट का शायद पहला उदहारण है !ये ही एक उदहारण है जहाँ सत्ता युद्ध से लेने नहीं लेकिन त्याग पिता के बनो और अधिकार के लिए हुआ,ऐसा उद्धरण विश्व इतिहास में मिलने मुश्किल है सुन्दर लेख के लिए धन्यवाद्.

J L Singh के द्वारा
October 5, 2016

भारत की ब्याकुलता देखकर बशिष्ट जी ने कहा था जो मुझे हर वक्त याद रहता है- सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहे मुनिनाथ. हानि लाभ जीवन मरण, जस अपजस विधि हाथ!

sinsera के द्वारा
October 5, 2016

आदरणीय शोभाजी, नमस्कार, आपके लेखों की एक विशेषता है कि जानी बूझी बात का कोई नया पहलू उजागर करती हैं. राम कथा सभी सुनते , पढ़ते और जानते हैं लेकिन मर्म तक जल्दी कोई नहीं जाता. भारत धरती, अयोध्या नगरी और रघुकुल का ऐसे ही नहीं डंका बजता है. नयी नयी बातें बताने के लिए आप का धन्यवाद.

Shobha के द्वारा
October 6, 2016

श्री आदरणीय रमेश जी यदि मैं पढ़ती नहीं कथावाचक होती | में अपनी नानी और दादी को रामायण और भागवत सुनाया करती थी उस उम्र में अधिक समझ नहीं आता था अब तो हर प्रसंग का मर्म समझ में आता है | आपके लेखों से संस्कृति का महत्व समझ में आता है स्टूडेंट लाईफ में वैसा ही सोचती थी जैसा सभी सोचते हैं आपको एक प्रसंग लिख रही हूँ मेरा बेटा इंजीनियर है चंडी गढ़ में पढ़ा है मेरा मन था वह आगे एमबीए करे उसे शौर्ट कट चाहिए था अच्छी नौकरी मिल गयी अब क्या पढना हमारी जानकारी में एक महानुभाव थे उनके घर सुंदर काण्ड का पाठ था लेकिन जिन्होंने पाठ करना था वह आ नहीं सके शायद कोइ नाराजगी होगी उन्होंने मेरी बहनों को कहा मिल कर पाठ कर लेते हैं उन्होंने मुझे भी बुलावा भेजा में उनका साथ दे दूँ | मैं अपने बेटे से बातें कर रही मन में कहींसोच था लडका आगे और पढ़ लेता कितना अच्छा होता|विशवास करना मुश्किल हो गया घर आई वह ही अपनी मेज पर आगे पढ़ाई की तैयारी के लिए किताब खोल कर नोट्स बना रहा था सिलेक्ट भी हो गया सेक्शन में फर्स्ट आया घर मैं नास्तिक मानी जाती थी |

Shobha के द्वारा
October 6, 2016

श्री जवाहर जी बहुत सुंदर पंक्तिया यही सोच कर संतोष मिलता है |हमारी संस्कृति का जबाब नहीं है रामायण की पंक्तियाँ सबसे अधिक प्रयोग में लाई जाती है |

Shobha के द्वारा
October 6, 2016

प्रिय सरिता जी कई बार रामचरित्र मानस पढ़ी बाल्मीकि की रामायण भी पढ़ी लेकिन उम्र के साथ पता चला आदर्श राजा का यह भी रूप है राजनीति की दृष्टि से रामायण पूर्ण ग्रन्थ है साध्य और साधन की पवित्रता आज कहते हैं राजा कैसा भी हो लेकिन लगे ऐसा वह जन हित कारी है लेकिन राम के काल की नीति में आदर्श वाद की पराकाष्ठ है राजनीती है लेकिन मर्यादा से बंधी हुई लेख पढने के लिए धन्यवाद

डॉ अशोक भारद्वाज के द्वारा
October 9, 2016

 रामायण उत्तम आदर्श ग्रन्थ है हर चरित्र अपने में पूर्ण  और उत्तम है आज हम भगवान चरित्र मानस का केवल पाठ करते है मनन करना भूलते जा रहे हैं यदि याद रखेगें आने वाली जेनरेशन के संस्कार बचा सकेंगे है

sadguruji के द्वारा
October 9, 2016

आदरणीय डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! बहुत अच्छा लेख ! भगवान ही नहीं बल्कि उनके भाइयों ने भी एक से बढ़कर एक आदर्श प्रस्तुत किया ! हर घर को देने के लिए अति सुन्दर संस्कार और परिवार में सबके लिए अनुकरणीय आदर्श रामायण में है ! बहुत अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

Shobha के द्वारा
October 11, 2016

डाक्टर साहब सही लिखा है हम रामचरित्र मांस का केवल स्वर से पाठ करते हैं उसके आदर्श चरित्रों की पूजा गहराई में जाने की कभी कोशिश नहीं करते

Shobha के द्वारा
October 11, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी रामचरित्र मानस एक आदर्श ग्रन्थ है हर हिन्दू परिवार के घर आदर से रखा जाता है | आपने सही लिखा है रामायण से सुंदर संस्कार मिलते है नवरात्रों के दिनों में दशहरा से पहले रामलीला का मंचन हर शहर ग्राम में आदर से किया जाता है लेख पढने के लिए धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran