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‘जगदम्बा हरि आन | अब शठ चाहत कल्याण’ पार्ट -2

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लंका में राम और रावण के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था एक-एक कर लंका के योद्धा समाप्त हो रहे थे परेशान रावण को अपने भाई की याद आई उसने मंत्री को उन्हें जगाने के लिए भेजा कहते हैं वह छह माह निरंतर सोता था  एक दिन जग कर आमोद प्रमोद में लीन रहता था | रामलीला में कुम्भ कर्ण को जगाने के दृश्य का मंचन आकर्षक ढंग से करते हैं देख कर दर्शक हंसते –हंसते लोट पोट हो जाते हैं| मंत्री ने हर सम्भव साधन अपना कर कुम्भकर्ण को जगाने का प्रयत्न किया कानों के पास ढोल नगाड़े बजाये ,वह टस से मस नहीं हुआ अंत में 18000 हाथियों ने कतार बाँध कर उसके मुहं पर जल धारायें छोड़ी अब वह जग गया |खिड़की से उसने देखा रात का समय था| वह प्रकोष्ठ से बाहर आया झील में मुहं धोया रसोई घर से सुगन्धित भोजन की सुगंध आ रही थी कई पात्र मदिरा के भरे हुए थे, सुरक्षित दूरी पर मंत्री खड़ा था |मदिरा गले से उतारने के बाद कुम्भकर्ण ने असमय जगाने का कारण पूछा मंत्री ने विनम्रता पूर्वक उत्तर दिया आप निद्रा में लीन थे लेकिन लंका संकट में है हमारे अनुपम योद्धा काल के गाल में समा गये |कुम्भकर्ण को हैरानी हुई चारो और समुद्र द्वारा सुरक्षित लंका में शत्रु ने कैसे प्रवेश किया ?मंत्री ने कहा, राजकुमार बानर भालुओं की विशाल सेना ने सागर में पुल बाँध लिया है अयोध्या के निर्वासित राजकुमारों  राम और लक्ष्मण के नेतृत्व में लंका को चारो और से घेर लिया है |कुम्भकर्ण बड़े भाई से मिलने राजमहल में गया वह रावण के रथ के समीप बैठ गया रावण भाई के जगने का समाचार सुन कर आतुर हो गया उसमें नये जीवन का संचार हुआ महल के छज्जे पर खड़े हो कर उसका भाई से वार्तालाप हुआ | पूरा वार्तालाप कुम्भकर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालता है|

रावण बोला ,दुश्मन की विशाल सेना ने आंधी तूफ़ान की तरह आकर हमारे अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया हैं |कुम्भकर्ण ने पूछा आखिर ऐसा क्या अपराध हुआ है जिससे विवश हो कर दुश्मनों ने हमारे गढ़ को घेर लिया |वह पुल बनाते रहे, हमारी सुरक्षा को चुनोती देते रहे तुमने अपनी तरफ से पहल नहीं की |रावण ने उत्तर दिया बहन के अपमान का बदला लेने के लिए मैंने राम की पत्नी सीता का हरण किया है| कुम्भकर्ण गरजा सीता को हर लाये जगत जननी माँ को हर लाये अरे वह श्री नारायण की भार्या साक्षात लक्ष्मी हैं |उन्हें छल से उठा लाये, निरपराध स्त्री का हरन महा पाप है| जाओ सम्मान पूर्वक राम को उनकी भार्या लौटा दो यदि तुम्हें बहन के सम्मान की चिंता थी तो सीधे राम के साथ आर पार का युद्ध करते | रावण ने उत्तर दिया सीता को मैं अपनी भार्या बनाना चाहता  हूँ वह अत्यंत सौन्दर्य वती है ऐसा लगता है माया ने ही अपनी समस्त कलाओं के साथ उसका निर्माण किया है|  कुम्भकर्ण ने माथे पर हाथ मार कर कहा यह तुम्हारी भूल है| हे राजों में श्रेष्ठ भ्राता जिन्हें तुम पशु समझ रहे हो यह श्री नारायण के साथी है अब राक्षस जाति के विनाश का कारण बनेंगे |रावण क्रोधित हुआ जिस शिक्षा को मैं पसंद नहीं करता उसे सुनना भी नहीं चाहता , तुम्हें मेरी बात सुन्नी पड़ेगी पशुओं की बात जाने दो केवल श्री राम श्री नारायण के अवतार है वह अकेले ही हमारे कुल और जाति का विनाश करने में समर्थ है तुम विद्वान हो तुमने अखंड तप किया था अपने सिरों का यज्ञ वेदी में होम कर ब्रम्हा से अमरता का वरदान पाया था| आज तुम इच्छाओं की बली चढ़ना चाहते हो| भ्राता ब्रम्हा से इच्छित वरदान मिलने के बाद महर्षि नारद ने मुझे कहा था रावण ने अमरता प्राप्त की है लेकिन उसका और उसके कुल का विनाश भी विधि ने अपने हाथ से लिखा है |जब भी रावण अपनी शक्ति का दुरूपयोग करेगा श्री नारायण राम अवतार लेकर इसे अनुचित कृत्य का दंड देंगे भाई ब्राह्मण कुल में हमारा जन्म हुआ था |हमें विरासत में कुछ नहीं मिला था हमने अपने श्रम से सब कुछ अर्जित किया है | तुमने अपने पराक्रम से ख्याति पायी है उसे नष्ट मत करो |

रावण ने भाई के हितकारी सुझाव की चिंता नहीं की उसने कहा ठीक है मैं गलत मार्ग पर हूँ लेकिन मेरी रक्षा करना तुम्हारा धर्म है | भ्राता किसी की पत्नि चुराना क्या धर्म था ? पाप की खेती तुमने बोई है लेकिन इसका परिणाम समस्त राक्षस जाति भोगेगी| उत्तम राजा प्रजा का रक्षक होता है उसका गलत कर्म सबके जीवन को खतरे में डाल देता है तुम्हारे मंत्री कुकृत्य पर मन से तुम्हारा साथ नहीं दे रहे हैं | विभीषण नीतिज्ञ था क्या उसने भी तुम्हें नहीं रोका ?रावण ने क्रोधित होकर कहा ,मुझे पहले ही उसका वध करना चाहिए था| मेरे द्वारा अपमानित होने पर शत्रु का शरणागत हो गया है कुम्भकर्ण ने माथे पर हाथ मार कर कहा तुमने कूटनीतिक भूल की है |अंत में कुम्भकर्ण ने निराशा से सिर झुका कर कहा तुम्हे नीति समझायी तुम नहीं माने तुम मेरे भाई हो गलत मार्ग पर हो |विपत्ति का कारण भी स्वयम हो तुम्हारा साथ देना पाप का साथ देना है लेकिन मैं तुम्हारे दुःख ,सुख ,पाप एवं पुण्य का सहभागी होकर तुम्हार पक्ष से लडूंगा |मेरे देश पर संकट आया दुर्भाग्य मैं सोता रहा| मेरा भाई अधर्म मार्ग पर चल रहा था मैं शिशु के समान कोमल भावों में डूबा रहा अब अपनी मातृभूमि अपनी जाति की रक्षा के लिए अंतिम क्षण तक लडूंगा |रावण ने कुम्भकर्ण को सेनापति बना कर उसके मस्तक पर तिलक लगाया उसे अपनी सेना अर्पित की लेकिन उसने इंकार करते हुए कहा सेना तुम्हारी रक्षा के लिये है | अकेले ही युद्ध भूमि की और प्रस्थान करते हुए वह मुस्कराया ‘जहाँ धर्म है वहीं विजय है मुझे तो युद्ध करना है’ युद्ध वेश में सज कर मदिरा से भरा घड़ा गले से उतार कर वह युद्ध क्षेत्र में आया उसे देख कर हा-हा कार मच गया |

यह योद्धा अपने में पूरी सेना था जो हाथ पड़ा वही उसका हथियार था उसने बानर और भालुओं की और देखा भी नहीं यह तो उद्यानों की शोभा बढ़ाने वाले जीव हैं |उसके नेत्र केवल श्री राम को ढूँढ़ रहे थे| विभीषण ने भाई को  समक्ष आ कर प्रणाम किया |कुम्भकर्ण के मन में कोमल भाव जागे उसने उन्हें गले से लगा कर कहा ‘हर व्यक्ति अपने-अपने मत के अनुसार पक्ष धारण करते हैं तुमने राम का पक्ष धारण किया मैने अपने भाई को संकट में देख कर उसका पक्ष लिया मैं तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ |परन्तु मुझ पर रण रंग चढा है अब मेरे सामने से हट जाओ’ |श्री राम ने सामने मृत्यु का विशाल मूर्त रूप देख कर विभीषण से पूछा यह लंका पक्ष से कौन आ रहा है? विभीषण ने उत्तर दिया लंका की शक्ति का मूर्त रूप विद्वान मेरा भाई है | यह चाहे तो सारी सेना को कुछ ही समय में नष्ट कर सकता है |प्रभु इसे आप ही रोक सकते हैं | कुम्भकर्ण के नेत्र केवल राम को खोज रहे थे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आत्मा परमात्मा में लीन होने के  के लिए आतुर है |हनुमान ने उसे रोकने का निरर्थक प्रयत्न किया, सुग्रीव बड़ी मुश्किल से उसकी पकड़ से बचा | श्री राम और कुम्भकर्ण का सामना हुआ कुम्भकर्ण हर शस्त्र विद्या का ज्ञाता था |सभी रुक कर अनोखे युद्ध को देखने लगे राम की कमान से असंख्य वाण छू रहे थे |कुम्भकर्ण हर वाण को काट रहा था| तीक्ष्ण बाणों से उसकी भुजाये काट डाली तब भी वह बढ़ता आ रहा था अंत में कई बाण उसके कंठ में लगे | सिर कर रावण के सामने गिरा अंत में केवल धड ने ही प्रलय मचा दी| राम के तीक्ष्ण वाणों ने धड़ को बीच से चीर दिया| कुम्भकर्ण का मृत शरीर धरती पर गिर पड़ा उसकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो गयी| उसका जन्म लेना सफल हो गया वह अपनी राह चला गया |

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
October 12, 2016

जय श्री राम शोभा जी सुन्दर विवरण के लिए बधाई.जब खर दूषण त्रिशरा मारे गए और सूचना सूपनखा ने रावण को दी तो उसने विचार किया खर दूषण मोई सम बलवंता तिन्ही को मारे  बिन भगवंता,तब रावन ने सोचा के होहई भजन न तामस  देहा इससे अच्छा भगवान् के हाथ मर  कर मुक्ति पाऊ इसीलिये वह युद्ध बंद नहीं कर रहा था जबकि मंदोदरी,कुम्भकरण,हनुमानजी,अंगद जी माल्यवंत  आदि ने बहुत  समझाया ,उसकी सोच यदि साधारण मनुष्य तो जीत  लेंगे और भगवान् हुए तो मुक्ति मिल  जायेगी.भगवान् राम को जीतने में बहुत मेहनत  और बहुत योजनाये बनानी पडी.मरते वक़्त उसने लक्ष्मण जी को जो उपदेश दिए वे बहुत ही व्यावारिक थे.१.अच्छे  काम  को फ़ौरन करे बुरे को ताल दे फिर कहता हमने सीताजी का अपहरण कर लिया लेकिन स्वर्ग तक सीडी बनवाना और समुद्रजल को मीठा बनाने का काम ताल गया.रामायण जितनी पढी जाए उतनी ज्ञान बढ़ता खास कर कथावाचको द्वारा.आपकी सुन्दर लेखन कला के लिए शब्द नहीं.

Shobha के द्वारा
October 12, 2016

श्री आदरणीय रमेश जी आपके द्वारा लिखी प्रतिक्रिया से सोचने के लिए बहुत विषय मिले सही है रामचरित्र मांस अपने में सम्पूर्ण ग्रन्थ है रावण का यह सोच श्री राम के हाथों मृत्यु मुक्ति का मार्ग है मोदी जी ने दशहरा पर्व पर जयश्री राम का घोष किया उसी पर बहस शुरू हो गयी

अभिजात के द्वारा
October 17, 2016

पूरा लेख पढने पर पता चला कुम्भकर्ण बहुत विवेक शील था |उसने युद्ध में अकेले ही युद्ध किया रावण की सेना भी नहीं ली

Shobha के द्वारा
October 18, 2016

अभिजात जी तीनो भाई सेल्फ मेड थे राज्य का विस्तार रावण एवं भाईयों ने अपने बाहुबल से किया था |रक्ष संस्कृति का संरक्ष्ण किया था

Anjana के द्वारा
October 20, 2016

बहुत खूबसूरत ढंग से आपने कुम्भकर्ण का चरित्र उभारा है विभीषण और कुम्भकर्ण रावण के भाई एक ने शत्रु पक्ष ग्रहण किया दूसरे ने भी को प्रताड़ित किया लेकिन बुरे समय में भाई का साथ दिया उसी के पक्ष में वीरगति पाई

Shobha के द्वारा
October 22, 2016

प्रिय अंजना जी आपने लेख पढ़ा आपको पसंद आया बहुत धन्यवाद


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