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गोवर्धन पूजा (अन्न कूट ) कान्हा का सच्चा समाजवाद

Posted On: 30 Oct, 2016 Junction Forum,Politics,Religious में

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Govardhan-Pooja-1गोधूली वेला में कान्हा गाय चरा कर लौट रहे थे सम्पन्न घरों में तरह –तरह के पकवानों की सुगन्ध फैली हुयी थी उन्हें याद आया इंद्र देवता को प्रसन्न करने का आयोजन हो रहा है जिससे उनकी कृपा दृष्टि बृज भूमि पर बनी रहे| सिचाई के लिए समय पर वर्षा हो जिससे भरपूर फसल से खेत खलियान भर जाये | कृषि प्रधान देश है कृषि के लिए वर्षा पर ही निर्भर हैं | रिमझिम बरसता पानी पूरे वर्ष के लिए कुएं तालाब झीले  भर देता है जिससे ग्रीष्म ऋतू में भी जल की समस्या नही आती | यदि इंद्र देवता की कृपा नहीं हुई सूखा पड़ गया खेतों में खड़ी फसल सूख जाती है इन्सान जानवर और परिंदे प्यास से तड़फने लगते हैं धरती की ऊपरी परतें सूख जाती हैं | कई बार इन्सान को ज़िंदा रहने के लिए अपना घर बार स्थान छोड़ कर परदेशी होना पड़ता है| इसी लिए बृज चौरासी कोस में इंद्र का पूजन विधि विधान से करते हैं कन्हैया ने कहा मैंने जब से होश सम्भाला है आयोजन देख रहा हूँ लेकिन यदि बृज में गोवर्धन पर्वत श्रंखलायें नहीं होती यह स्थान भी मरूस्थल ही होता | गर्मी से सागर में भाफ के बादल बनते हैं हवायें उन्हें उड़ा कर दूर ले जाती हैं गोवर्धन पर्वत के हरे भरे सघन वन और ऊँचे वृक्षों पर एक नमी रहती हैं जिससे उड़ते घनघोर बादल आकर्षित होते हैं जिससे मुसलाधार बारिश होती है|जहाँ पर्वत और वन नहीं है वहाँ बारिश कम होती है  मूसलाधार बारिश से गिरिराज की कन्दराओं में पानी भर जाता है बड़ी मात्रा में जल सूखी धरती पी जाती है | धरती की प्यास बुझने के बाद नीचे संचित हो जाता है | संचित जल से कुएं तालाब झीलें भर जाती है |यमुना जी उफन कर बहने लगती हैं उनके पाट चौड़े हो जाते हैं |पर्वत से अनेक झरने झरते हैं जिनसे आते जाते राहगीर प्यास बुझाते हैं |यदि वन कम हो जायेंगे या काट दिए जायेंगे बादल कैसे आकर्षित होंगे जिससे ,वर्षा भी कम होती जायेगी  |वनों की गोद में जीवन दायनी औषधियां और पेड़ पोधे फलते फूलते हैं यहाँ लकड़ी ही नहीं मिलती रसीले फल और तरह-तरह की जड़ी बूटियाँ मिलती हैं जिनसे रोग निवारक औषधियाँ बनती हैं | जल से भरी यमुना बहती हुई जल को दूर-दूर तक ले जाती है | जल से ही जीवन है इसीलिए नदियों के किनारे सभ्यतायें बनती बिगडती हैं | यदि बाढ़ें आती हैं खेती का नुक्सान होता है लेकिन अपने साथ उपजाऊ मिटटी भी ले जाती हैं जिससे अगली फसल शानदार होती हैं |विशाल वृक्षों में अनेक पंछियों का बसेरा होता है |वनों मे अनेक जीव जन्तु पलते हैं | कीट जगत , जानवरों एवं पक्षियों की प्रजातियाँ बढ़ती हैं | गिरिराज जी प्रकृति की अचल सम्पदा से भरपूर हैं |सुंदर दृश्य मन को मोह लेते हैं| पर्वतों में विचरण करते हैं सुगन्धित स्वास्थ्य वर्धक वायू तन और मन को पुलकित करती है| सुबह का सूरज उगता है चारों और प्रकाश फैलता है पक्षी चहचहाने लगते हैं ,कोयल की मीठी कुहुक मन मोह लेती है क्यों न हम ऐसा उत्सव मनाये जिसे बृज भूमि में सदैव याद किया जाये |

कन्हैया की ज्ञान भरी बातों से सभी प्रभावित हुये अबकी बार क्यों न गिरिराज जी का मिल कर पूजन किया जाये और सामहिक भोज का आयोजन किया जाए जिसमें हर व्यक्ति बिना किसी भेद भाव के भाग ले सके जिसके घर में जो है वह  भोज में समर्पित करे| गोकुल के लोगों का मुख्य व्यवसाय गो पालन , गो  चराना और खेती करना था |  बृज की गोपिया रोज मथुरा में दूध दही मक्खन बेचने जाती थी |अभी बृज पूरी तरह आत्म निर्भर नही था| गोवर्धन पर्वत पर सामूहिक भोज का आयोजन किया गया जिसमें हर व्यक्ति ,घर ने भाग लिया जिसके घर में जो था जिसकी जो सामर्थ्य थी पका कर लाया घी दूध , छाछ दहीं की कमी नहीं थी अत: खीर कढ़ी तरह-तरह के रायते मीठा दहीं माखन मिश्री चावल अनेक प्रकार की सब्जियां ,दूध से बनी घरेलू मिठाईयाँ बाजरे की अभी कटी थी उसकी स्वादिष्ट खिचड़ी | जिसके घर के बाग़ में गाजर मूली लगी थी वह वही तोड़ लाया | वृन्दावन का  कोई  घर ऐसा नहीं था जहाँ से कन्हैया ने दही ,माखन चुरा कर स्वयं खाया और ग्वाल बालों को न खिलाया हो| हर घर में उनके पवित्र चरण पड़ें थे हर छींके पर बाल गोपालों के कंधों पर सवार हो कर माखन का भोग न लगाया था | कवि रसखान कहते हैं

जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।

भोज में हर वस्तु थी हर घर व्यक्ति की साझे दारी थी| एक चौड़े स्थान को साफ़  किया गया पूरा गोकुल धाम बिराजा सबके आगे पत्तल दोने मिटटी के जरूरत के बर्तन लगा दिए गये |सबसे पहले अग्र पूजा किसकी हो? गिरिराज जी का आह्वाहन किया गया बीच में कान्हा बिराजे उनका पूजन किया गया | मंद – मंद सुगन्धित पवन बह रही| झरनों की कल – कल संगीत का समा बना रही थी |सबके आग्रह पर उन्होंने मुरली की मधुर तान छेड़ दी सम्पूर्ण वातावरण विभोर हो गया | मुरली की ध्वनि ऐसी अलौकिक थी मानों समय ठहर गया | अब भोज की बारी थी जो भी उपस्थित था सबकी पत्तल में सब कुछ परोसा गया सबने प्रेम सेचटकारे ले कर भोजन किया कुछ भी जूठा नहीं छोड़ा | यह गिरिराज जी का भोग था | यह था सच्चा समाजवाद कान्हा का समाजवाद |यह आज के यदु वंशियों का समाजवाद या राजशाही नहीं थी | कोई न बड़ा था न छोटा सभी समान थे | विशुद्ध पर्यावरण प्रेम |आज भी बृज वासी विश्व में खिन भी रहें दीपावली के अगले दिन कान्हा का भोग लगाते हैं पर्व को अन्नकूट कहते हैं |

डॉ शोभा भारद्वाज

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anil bhagi के द्वारा
November 4, 2016

प्रिय शोभा जी गौवर्धन पूजा नए रूप में पढ़ने को मिली जिसमें आपने पर्यावरण पर जोर दिया

Shobha के द्वारा
November 5, 2016

श्री कृष्ण सच्चे पर्यावरण वादी थी उनका बचपन बृज मैं गाय चराते प्रकृति की गोद में बीता था |

drashok के द्वारा
November 5, 2016

मैडम बृज 84 कोस में निवास करने वाले अन्नकूट बहुत धूमधाम से मनाते हैं | बहुत अच्छा लेख

sadguruji के द्वारा
November 5, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! कान्हा का समाजवाद बहुत पसन्द आया ! अच्छा लिखा है आपने ! सादर अभिनन्दन और हार्दिक बधाई ! देर से सही, आपको और आपके समस्त परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं ! आप और डॉक्टर साहब सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहें ! सादर आभार !

Shobha के द्वारा
November 5, 2016

लेख पढने और पसंद करने के लिए धन्यवाद

Shobha के द्वारा
November 5, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी मैंने अलग तरह से अन्नकूट गोवर्धन पूजा पर लेख लिखा था आपको पसंद आया धन्यवाद

अंजना भागी के द्वारा
November 8, 2016

प्रिय शोभा जी हमारे यहाँ अन्नकूट का पर्व मन्दिरों में बहुत धूम धाम से मनाया जाता है मुख्यतया कढ़ी चावल सब्जी मिक्स सब्जी पूरी और खीर का प्रशाद बांटते है आपने अधूरी कहानी लिखी है आगे इंद्र द्वारा कोप की भी कथा है |

Shobha के द्वारा
November 10, 2016

प्रिय अंजना जी लेख पढने और पसंद करने के लिए अतिशय धन्यवाद

achyutamkeshvam के द्वारा
November 15, 2016

जय गिरिराज जी की

Shobha के द्वारा
November 16, 2016

प्रिय प्रिय अच्युत जी अपने नाम के अनुरूप अति सुंदर प्रतिक्रिया


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