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चुनाव प्रचार में प्रोपगंडा चुनाव परिणाम की दिशा बदल देता है ?

Posted On: 28 Feb, 2017 Junction Forum में

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चुनाव रैलियों में नेताओं के भाषण के लिए शानदार ऊंचे मंच बनाये जाते हैं मंच पर सम्मानीय मुख्य वक्ता के गले में उनके वजन से भी बड़ा फूलों का हार पहना कर फोटो सेशन होता है | रैलियों में भीड़ लाई जाती है कैसे ? विशाल रोड शो किसी दल का आठ मील तो किसी का बारह मील| भाषणों के दौरान प्रतिद्वंदी पार्टियों और नेताओं पर बिना प्रूफ के आरोप प्रत्यारोपों की झड़ी लगाना, बिना सोचे समझे ऐसे बोल बोलना कसाई भी शर्मा जाये खून से रंगे हाथ ,मौत का सौदागर हैं लगता है एक दूसरे के वैरी आमने सामने खड़े हैं , नये सूत्र गढ़े जाते हैं जैसे कसाब (पाकिस्तानी आतंकी ) कांग्रेस ,सपा ,बसपा जबाब में कम्प्यूटर ,साईकिल और बस |ईद रमजान पर बिजली लगातार दी जाती है दीवाली में कोताही बरती जाती है , श्मशान ,कब्रिस्तान की चर्चा ,अंतिम निवास के लिए दोनों जरूरी हैं लेकिन हिन्दुओं में शव का अंतिम संस्कार जला कर किया जाता है राख नदियों में प्रवाहित की जाती है अत: एक ही श्मशान वर्षों से चल रहे हैं केवल मृतक के अंतिम स्नान के लिए गंगा जल की ही बात की जा सकती हैं |मुस्लिम समाज के मृतक आखिरात का इंतजार कब्र में करते हैं उनको विस्तृत कब्रिस्तान चाहिए |

रिजल्ट आने से पहले ही प्री पोल का चैनलों में चलन बढ़ा है कुछ लोगों से पूछ कर किस दल के कितने उम्मीदवार विजयी होंगे लेकिन अब चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने रोक लगा दी है | चुनावी परिणाम पूरी तरह से प्रोपगंडे पर ही आधारित नहीं होते कई तिकड़में लगाई जाती हैं| पहले चुनावों में बाहुबलियों को चुनाव में ठेका दिया जाता था मतदान की शुरूआत ही बूथ कैप्चरिंग से होती थी सब के वोट पर एक उम्मीदवार का ठप्पा लगा दिया जाता था पुलिस देखती रहती थी, मतदाता भय से बोल नहीं पाते अब बाहुबलियों ने सोचा दूसरों को जिताने से अच्छा है वह स्वयं ही चुनाव लड़ लें | संसद रुपी प्रजातन्त्र के मन्दिर में अपराधी पहुंच गये जिन पर कई अपराधिक मामले चल रहे है | इसका निदान निकला चुनाव कई चरणों में हो रहे हैं | पुलिस बल लगा कर शान्ति पूर्ण ढंग से चुनाव कराने की कोशिश की जाती है| संसद में अपराधियों को जाने से रोकने के लिए भी कई कानून बने हैं लेकिन जब तक किसी का अपराध सिद्ध न हो जाये उन्हें चुनाव लड़ने से कैसे रोका जा सकता है? एफआईआर दर्ज है पर उम्मीदवार धडल्ले से चुनाव लड़ रहे हैं |न्याय प्रक्रिया की गति धीमीं है |

चुनाव जीतने के लिए खुल कर प्रलोभन देने का चलन बढ़ रहा है जैसे पहले सबको लैपटाप और साईकिल दिया था अबकी बार स्मार्ट फोन , गृहणियों को प्रेशर कुकर देंगे |किसानों का ऋण माफ़ कर देंगे, बिजली सस्ती होगी और भी न जाने क्या-क्या ?असली वोट की खरीद फ़रोख्त चुनाव से पहले की रात में होती है जम कर शराब पियो कम्बल बांटना आम बात है |जेब में नोट डाले जाते थे लेकिन नोट बंदी के बाद ‘देंगे’ वचन दिए जा रहे हैं | महिलाओं के वोट हासिल करने के लिए कई योजनाये शुरू करने की घोषणा करते हैं वर्ग विशेष की लड़कियों के लिए विशेष पैकेज हर गर्भवती महिलाओं को प्रसव के समय छह हजार रुपया दिया जाएगा जबकि हर महिला और बाल कल्याण सरकार के कार्यों में शामिल है | चुनाव से पहले ही वोटर लिस्ट से मौका लगते ही वोटरों का नाम कटवा दिया जाता है और नकली वोट बनवा कर वोट पक्के कर लेते हैं | क्या यह सब जनता की सेवा के लिए किया जा रहा है ? ऐसे विवादित बोल बोले जाते हैं जिससे मीडिया आकर्षित हो कर हेड लाइन बना ले |बिना कुछ बोले प्रोपगंडा शुरू हो जाये पक्ष में लहर बने|

उत्तरप्रदेश का चुनाव सात चरणों में हो रहा है चुनावी प्रचार भी जोरों पर है सत्ता पकड़ने के लिए जो सम्भव है सब कुछ हो रहा है |लोक सभा में 73 सांसद भाजपा को यूपी ने दिए थे केवल मुलायम सिंह यादव का कुनबा अपनी सीट बचा पाया था |यहाँ की चुनावी हवा उसी दिन से बहने लगी थी जिस दिन मीडिया में मुलायम सिंह परिवार में फूट की चर्चा होने लगी ऐसा प्रोपगंडा, शहरों, गावों, कस्बों में मुख्यमंत्री अखिलेश उनके पिता और चाचा के झगड़े, अखिलेश को सपा से निकाला जाना, अखिलेश का स्वयं अध्यक्ष बनना ,चुनाव चिन्ह का झगड़ा ,पार्टी के नाम का झगड़ा , योजना बद्ध ढंग से चला रहा था अंत में कुछ भी नहीं बटा | अखिलेश ने कीचड़ में कमल की तरह अपने खिलने का अहसास दिलाया | कांग्रेस और सपा का गठ्बन्धन हो गया दो बैरी दल अब दोस्त बन गये राहुल गाँधी और अखिलेश दो खानदानी राजकुमार मिल कर प्रचार कर रहे हैं | मायावती जी बुआ और अखिलेश बबुआ |चैनलों में यूपी ही चर्चा का केंद्र बना है | दोनों युवा नेता मोदी जी को धार पर लेने लगे हैं स्थानीय समस्याओं के स्थान पर देश की समस्यायें मुख्य हो गयी |

यूपी में 30% लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं रोजी रोटी की खोज में महानगरों में पलायन के लिए मजबूर हैं| चुनाव का मुख्य मुद्दा विकास होना चाहिए था| बुन्देलखण्ड में सूखा और पीने के पानी की समस्या से जूझ  रहा था अचानक सब सही हो गया प्रदेश में महिलाएं असुरक्षित हैं अपराध बढ़ रहे हैं | सभी दलों को अब किसानों की चिंता सताने लगी उनके कर्ज माफ़ करने या गरीब किसानों को कर्ज माफ़ी में सहूलियत देने की बात कर रहे हैं |अजीब हैरानी की बात है गुजरात के गधे और महानायक बच्चन के विज्ञापन के चर्चे चले |कच्छ में गधों को पाला जाता है उन्हें पालने वालों का व्यवसाय है |वह इतने स्वस्थ है 70 किलोमीटर एक घंटे में तय करते हैं | गधा बोझ ढोने में अहमियत रखता है पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरत हैं | सबसे अधिक मेहनत मुस्लिम वोटर पकड़ने की है सपा उनको अपना वोट बैंक मानती रही है मायावती उनको अपनी तरफ आकर्षित कर दलित और मुस्लिम वोट बना कर अपनी जीत पक्की कर रहीं हैं उनका मुख्य चुनावी प्रोपगंडा है उन्होंने उन्हें सबसे अधिक सीटें दी है | ओबेसी भी मुस्लिम समाज के हमदर्द बन कर बड़े – बड़े डायलाग बोल कर मुस्लिम समाज के बल पर राष्ट्रीय नेता बनने के इच्छुक हैं| भाजपा को मुस्लिम विरोधी दल करार किया जा रहा है उन्होंने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया उनका अपना तर्क है हम सबका विकास सबको साथ लेकर चलते हैं ,विकास में सबकी हिस्सेदारी होती है | सपा का नारा है ‘काम बोलता है’ कौन से काम ? चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले अनेक योजनाये शुरू करने की घोषणाएं की गयीं हाँ हाई वे बनाने का जिक्र जम कर किया जा रहा है|

विज्ञापन एजेंसिया नामी क्रिएटिव डायरेक्टर उनकी टीम नये जुमले गढ़ने के  काम पर लगे है रोज रोचक जुमले फिर उनकी काट ,काट की भी काट| चुनाव जीतने के तरीके बदल गये हैं झंडियाँ बैनर कम दिखाई देते हैं ढोल नगाड़े भी कम सुनाई देते हैं | राम मन्दिर का मुद्दा फिर उछला गया जबकि मामला सुप्रीम  कोर्ट में है |ट्रिपल तलाक का मामला भी जोर शोर से चल रहा है मुस्लिम महिलाओं को ही अपने पक्ष में किया जा सके कुछ मुद्दे तो केवल चुनावी प्रपंच हैं ज्यादातर भाषणों में जनता को उलझाने की कोशिश की जाती है लच्छे दार जुमलों से जनता को हंसाते और उत्तेजित कर तालियाँ पिटवाते हैं या नारे लगवाते हैं | मीडिया भी रोचक विषयों पर बहस करवा रही है कुछ बहस के मूड में न होकर अपने आप को सताया हुआ बताने की कोशिश में चैनलों का प्राईम टाईम खराब करते हैं पुरानी घिसी पिटी बातें टीवी दर्शक भी चुनावी बहस सुनने के बजाय सीरियल देखने में अधिक रूचि लेते हैं| नोट बंदी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की गयी भाजपा के प्रचारक उसके लाभ गिना रहे हैं अन्य दल उससे होने वाले नुक्सान बता रहें हैं | अखिलेश जी की नजर में पैसा, पैसा होता है न काला न सफेद|

नेतागण जो बोलते हैं उन्हें भी याद नहीं रहता | हैरानी होती है कांग्रेस और सपा का गठ्बन्धन हुआ लेकिन जनता को इसे मजबूरी में किया गठ्बन्धन समझाया जा रहा है| हंसी आती है जब कहते हैं हमें साम्प्रदायिक ताकतों को रोकना है उनसे लड़ना है जबकि देश संविधान से चलता है संविधान की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट है | संसद और विधान सभाओं में बहस के लिए मजबूत विपक्ष है |17 सीटों पर कांग्रेस और सपा आमने सामने लड़ रहीं हैं | अखिलेश यादव की सांसद धर्मपत्नी डिम्पल यादव स्टार प्रचारक हैं वह मतदातों से मुहं दिखाई में अपने उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहीं हैं अर्थात और पांच वर्ष के लिए सत्ता पर कब्जा | शानदार प्रोपगंडा चुनावों तक अखिलेश भैया ,डिम्पल भाभी हैं | चुनाव सम्पन्न हो जायेंगे उत्सव का माहौल और मेला झमेला सब खत्म हो जाएगा नेता मतदाता से दूर होते जायेंगे यदि विधान सभाओं में बहुमत मिल गया, सरकार बन जायेगी यदि नहीं मिला, मिली जुली सरकार के जोड़ तोड़ में लग जायेंगे या विपक्ष में बैठ कर सदन चलने नहीं देंगे जनता भी जानती है अपनी मेहनत से ही उनका भला होगा |

हर दल में सम्मानित नेताओं के बच्चे भी चुनाव लड़ रहे हैं वह अपनी ताकत दिखाने के लिए कारों का काफिला और अपने लोग लेकर चलते हैं जिन्हें कभी देखा नहीं वह जनता की सेवा का दम भरते हैं जबकि मतदाता उन्हें पहचानते भी नहीं हाँ उनके नाम के साथ उनके पिता का नाम चल रहा है | अब तो चुनावों में नई परिपाटी चल निकली हैं नेता जी मुलायम सिंह ,लालू प्रसाद और गांधी नेहरु परिवार की तो विरासत चल ही रही थे अब हर नेता अपनी पत्नी, बेटे, बेटी ,दामाद, भाई बहू धेवते और भतीजों को चुनाव लड़वा रहे हैं कार्यकर्ता एड़ी चोटी का जोर लगाते हैं एक दिन उनको भी चुनाव में टिकट मिलेगा वह जनता की समस्याए सुनते थे उनके काम कराते हैं , सिटिंग एमएलए व जनता के समीप रहे नेता टिकट न मिलने से कुंद हैं भीतरी फूट उनके वक्तव्यों से उजागर हो ही जाती है| एक मोदी जी हैं जिनको किसी को अपनी विरासत नहीं देनी जबकि उनके भी भाई हैं |

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
February 28, 2017

मतदान का प्रतिशत कहीं ज्यादा और कहीं कम मतदाताओं की उदासीनता को ही दर्शाता है. दरअसल पार्टियां जितना प्रचार में खर्च करती हैं उसका आधा भी जनकल्याण कार्यों करती तो इतनी ज्यादा छीछालेदर किसी की न होती. आज हम्म में सभी नागे नजर आ रहे हैं. फिर भी ११ मार्च का इन्तजार तो करना ही है. सादर आदरणीया शोभा जी!

Shobha के द्वारा
March 6, 2017

श्री जवाहर जी अगर जनता सुखी और सम्पन्न हो जायेगी फिर वोट किस आधार पर मांगेगें जन कल्याण की बस बात की जाती हैं लेख पढने के लिए धन्यवाद

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 9, 2017

शोभा जी चुनाव प्रचार पर अच्छा लिखा है आपने । वाकई यह सभी हदे पार कर रहा है । जिसके मुंह मे जो आया वह बोल देता है ।इस पर रोक लगाये जाने की जरूरत है ।

Shobha के द्वारा
March 11, 2017

श्री बिष्ट जी लेख पढने के लिए धन्यवाद अब तो रिजल्ट का इंतजार है |

anjana bhagi के द्वारा
March 19, 2017

शोभा दी अबकी बार अजीबोगरीब ब्यान हर राजनितिक दल ने दिए योगी जी ने हिंदुत्व का एजेंडा सामने रखा समझ नहीं आ रहा विकास के नाम पर भाजपा जीती या योगी आदित्यनाथ के फार्मूले पर जनता उनसे आशा करती हैं विकास और महिलाएं सुरक्षा

Shobha के द्वारा
March 21, 2017

प्रिय अंजना जी अबकी बार का चुनाव मुद्दों पर कम चटपटी बातों कर लड़ा गया था लेख पढने के लिए धन्यवाद


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