Vichar Manthan

Mere vicharon ka sangrah

219 Posts

2960 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 15986 postid : 1319750

मौसीकी (गायन )पर फतवा, कैसी राजनीति ?

Posted On: 18 Mar, 2017 Junction Forum में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पाकिस्तान की प्रसिद्ध सूफी गायिका आबिदा परवीन की ऊपर वाले (अल्लाह) की शान में गायीं उनकी पंक्तियाँ मुझे याद आयीं,

“ जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है संग हर शख्स ने हाथों में उठा रखा है”

2015 में इंडियन आईडल जूनियर में उपविजेता रही नाहिदा आफरीन को 25 मार्च को उदाली में होने वाले कार्यक्रम में मंच पर गाना है लेकिन मौलवियों ने उसके विरोध में फतवा दे दिया उनके अनुसार किसी मुस्लिम लड़की का मंच पर गाना शरीयत के खिलाफ है अत: 46 मौलानों ने फतवा ही नही पोस्टर बना कर शहर भर की दीवारों पर चस्पा करवा दिया | फतवा आज कल चर्चा का विषय बना हुआ है शुरू में 16 वर्ष की नाहिदा डर गयी थी लेकिन असम के मुख्यमंत्री सर्वानन्द सोनेवाल के सुरक्षा देने के आश्वासन और अनेक असम के संगठनों के समर्थन पर नाहिद को हौसला मिला उसने कहा वह गाना जरुर गायेगी संगीत मेरी जिन्दगी है अल्लाह ने मुझे आवाज से बख्शा है और अगर गाने नहीं दिया मैं मर जाउंगी |आफरीन –आफरीन ( फ़ारसी में शाबाश ) नाहिद | मुस्लिम विचारक कहते हैं पवित्र कुरआन में संगीत के विषय में कुछ भी नहीं कहा गया हाँ हदीस में जरुर इसका वर्णन है आगे कहते हैं ‘पैगम्बर’ उनकी विजय के उपलक्ष में मदीने की बालिकाओं ने गा कर ,ढप्प बजा कर अपनी ख़ुशी का इजहार किया था, पैगम्बर हजूर ने सुना था |

इस्लाम का जन्म अरब की धरती पर हुआ तो सूफी वाद भी अरबिस्तान और ईराक की धरती पर जन्मा लेकिन ईरान में इसे आकार मिला था इसे मानने वाले सादगी का जीवन पसंद करते थे अनेक पर्शियन कवि उनका साहित्य जैसे फिरदौस का शाहनामा ,उमर ख्याम ,हाफ़िज, सादी और रूमी उन्हें कौन नही जानता उनकी अनेक रचनाएँ सूफी कलाम है इन सभी कवियों विचारकों में सूफी वाद पाया जाता है | ‘रूमी’ को  वाद्ययंत्र में बांसुरी बहुत भाती थी कहा जाता है फ़ारसी भाषा में सूफी का अर्थ ‘ज्ञान या बोध है इसमें साधक अपनी भावना को संगीत के साथ बार बार दोहराता है | कई सूफी मानते है जब संगीत के साथ कुछ सूत्रों का तेज स्वर ,तेज और तेज से उच्चारण किया जाता है वह साधक की आत्मा में समाविष्ट हो जाता है | ईरान के  खुर्दिस्तान (सुन्नी प्रदेश )में ढपली के स्वर और गायन से नृत्य के साथ आराधना करते हुये गोल-गोल घूमते हैं खुले लम्बे बालों को गर्दन के साथ आगे पीछे लहराते हैं एक अजीब सा जनूनी माहौल बनते देखा जा सकता है दर्शकों के पावँ भी थिरकने लगते हैं |

भारत की भूमि पर अमीर खुसरो फ़ारसी के माहिर जिन्हें उर्दू हिन्दवी का पहला शायर और महान संगीतकार  मानते हैं वह मशहूर सूफी संत निजामुद्दीन ओलिया के शागिर्द वह उनकी शान में गाते थे |

“बहुत कठिन है डगर पनघट की। कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
मेरे अच्छे निजाम पिया। पनिया भरन को मैं जो गई थी
छीन -झपट मोरी मटकी पटकी |बहुत कठिन है डगर पनघट की।
खुसरो निजाम के बल-बल जाइए |लाज राखी मेरे घूंघट पट की” ऐ मौलाना भूल गये क्या?

उन्होंने पखावज के दो हिस्से कर तबला और सितार जैसे वाद्य यंत्रों का आविष्कार किया था

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, दुराये नैना बनाये बतियां |
सखि पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां | इसमें फारसी और हिंदी का अद्भुत संगम है खुसरो साहब ने मसनवी लिखी जिसमें 2०००० शेर थे उस समय मौलाना रूमी भी एक मसनवी लिख रहे थे खुसरो ने अपनी गजले और शेर दरबारों में सुनाई उन्हें बलबन के जानशीन कैकुबाद ने राष्ट्रकवि घोषित किया था |नृत्य कत्थक, उत्तर भारत में मुगलों के समय शाही दरबार की शोभा बना इसे मुगल शासकों का संरक्षण मिला यहाँ नृत्य में धर्म की अपेक्षा सौन्दर्य पर बल दिया गया|

कुछ लोग फतवे के बारे में कहते हैं  फतवा राय है पहले प्रश्न पूछा जाता है तब फतवा जारी किया जाता है | फतवों का धार्मिक महत्व है समाज में इनका महत्व अब नहीं है | कैसे कह  सकते हैं इस्लाम में संगीत का स्थान नहीं है | कव्वालियों का भारत पाकिस्तान और बंगला देश में बहुत प्रचलन हैं पाकिस्तानी डाक्टर हुनर गुल ने बताया था बड़ी संख्या में लोग ईमान लाये ( धर्म परिवर्तन ) उन्हें कीर्तन और तेज संगीत के साथ धुन सुनने की आदत थी वह मन्दिरों के बाहर खड़ें रहते उनके दुःख को समझ कर कव्वाली खुदा की शान में म्यूजिक के साथ गायन का प्रचलन हुआ | कव्वाल क्या खूब गाते हैं फ़िल्मी कव्वालियाँ धूम मचा देती है अनेक फ़िल्मी  भजन ऐसे हैं जिनके लेखक ,संगीत कार और गायक मुस्लिम हैं मुहम्मद रफी साहब के भजन देश की आत्मा में बसे हैं|एक भजन

हरी ओम हरी ओम मन तरपत हरी दरशन को आज भक्ति रस से सराबोर कर  देता है |

उनके लिए फतवा क्यों नहीं ? पाकिस्तान में भारत से गयीं नूरजहाँ मलकाए तरन्नुम और रेशमा ने तो मजार पर गाया था बंगला देश की रूना लैला का “दमादम मस्त कलंदर “क्या धूम मचाता है लोग झूम उठते हैं | ,भारत में शमशाद बेगम ,सुरैया और मुबारक बेगम सब महिलाएं थीं उन पर फतवा क्यों नहीं ? हाँ ‘रहमान साहब’ के खिलाफ बम्बई की इस्लामिक संस्था ने  जरुर फतवा जारी किया था  अफ़सोस  किसी ने विरोध नहीं किया था |  देश में अभिव्यक्ति  की स्वतन्त्रता के नारे लगते हैं साहित्यकारों नें  राजनीति करते हुए  अपने पुरूस्कार लौटाये थे और मुन्नवर राणा ? एक प्रसिद्ध फिल्मकार ने तो अपनी हिन्दू पत्नी का नाम लेकर कहा था  देश में असहिष्णुता बढ़ रही है उनकी पत्नी बच्चों की सुरक्षा के लिए देश छोड़ने की बात कर रही है | क्या फ़िल्मी कलाकारों को आगे नहीं आना चाहिए ?  फतवे के खिलाफ बुद्धि जीवी अपने  बंद घरों में चर्चा करते हैं बाहर नहीं | जेएनयू और रामजस कालेज में  देश विरोधी नारे लगाने वालों की चर्चा  अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में जोड़ी गयी |

मुझे ईरान की गायिका गोगुश याद आयीं क्या खूब गाती थी उनकी खनकती आवाज उन पर इस्लामी सरकार आने के बाद पाबंदी लग गयी थी भारत प्रजातांत्रिक देश है क्या फतवे और शरीयत देश के संविधान से ऊपर हैं| या नाहिदा ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगो ‘ देश भक्ति का गीत गाना था इस पर एतराज है फिर तो मौलाना इकबाल का गीत “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा ” राष्ट्रीय गीत है उस पर भी एतराज करें| धर्म निरपेक्ष देश में धार्मिक कट्टरता क्यों बढती जा रही है ?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

10 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 21, 2017

आदरणीय डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! आपके ये लेख विशेष रूप से बहुत अच्छा लिखा गया है ! मेरी विस्तृत प्रतिक्रिया इस पर आपने जरूर पढ़ी होगी ! फतवे जारी करना गैरकानूनी और असंवैधानिक है ! अतः इस पर लोक लगनी ही चाहिए ! सादर आभार !

Shobha के द्वारा
March 21, 2017

जी आदरणीय सद्गुरु जी मेने लेख पर दिए गये विचार पढ़े थे आप सब के विचार लिखने की प्रेरणा देते हैं

anjana bhagi के द्वारा
March 22, 2017

प्रिय शोभा दी लगभग हर चैनल पर एस फतवे पर डिबेट हुई थी कई मौलाना मौसिकी को इस्लाम के विरुद्ध मान रहे थे लेकिन कुछ इसके विरुद्ध थे | सूफी संतो में तो गा कर ऊपर वाले की इबादत करते हैं

Shobha के द्वारा
March 22, 2017

प्रिय अंजना जी प्रसिद्धि पाने और अपने आपको सच्चा मौलाना सिद्ध करने के लिए ड्रामा किया गया है वाकी कव्वालियाँ किस तरह से झूम – झूम कर गई जाती हैं लेख पढने के लिए धन्यवाद

Bhola nath Pal के द्वारा
March 23, 2017

आदरणीय डॉ शोभा जी ! कुछ लोग समाज को फतवों से ही चलाना चाहते हैं …………सादर

Shobha के द्वारा
March 26, 2017

श्री भोला नाथ जी सही लिखा है आपने लेख पढने के लिए धन्यवाद

Anil bhagi के द्वारा
March 27, 2017

प्रिय शोभा जी सूफी कलाम और बुल्ले शाह मुझे क्या सभी को प्रिय है फिर गाने का विरोष हंसी आती है

Shobha के द्वारा
March 27, 2017

सही लिखा है आपने सूफी संगीत बड़ा मनमोहक होता है |लेख पढने के लिए धन्यवाद

drAKBhardwaj के द्वारा
May 8, 2017

इस्लामिक सरकारें मुस्लिम देशों में जहां भी है मौसिकी पर रोक लगा देती है नृत्य का तो सवाल ही नहीं उन्हीं का अनुकरण कर मुल्ले मौलाना फतवा दे रहे हैं जबकि फतवा सलाह है जो पूछी जाने पर दी जाती है

Shobha के द्वारा
May 8, 2017

डाक्टर साहब लेख पढने और अपनी राय देने के लिए धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran