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जंगल की जड़े शहर में पनपती हैं (नक्सल वाद )पार्ट - 1

Posted On: 10 May, 2017 Junction Forum में

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सत्तर के दशक में कालेज की दीवारों पर अनेक नारे छात्रों के लिए गढ़ कर लिखे गये थे| जैसे ‘सत्ता का जन्म बंदूक गोली से होता है’ किशोरावस्था से जवानी में पदार्पण करते आयु के जवान बहुत संवेदन शील तथा उनमें कुछ कर गुजरने की भावना होती है | छात्रों के बीच  बहस होने लगी चीन और भारत में राजनीतिक परिवर्तन एक साथ हुआ लेकिन कम्यूनिस्ट चीन ने इतनी तरक्की की भारत इतना पीछे क्यों रह गया ?1962 में चीन ने भारत पर हमला कर बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया हम कुछ नहीं कर सके | सशस्त्र क्रांति की राह अपनानी है हमारी क्रान्ति चीन जैसी सशस्त्र क्रान्ति बन कर परिवर्तन लाएगी |बहस को जन्म देने वाले छात्रों के बीच के ही छात्र थे बहस से जन मत बनाया जा रहा था |   नक्‍सलवाद कम्यूनिस्टों के बीच  में पनपने वाला आन्दोलन था इसके असली जनक कानू सान्याल माने जाते हैं। कानू का जन्‍म  दार्जिंलिग में हुआ था। वे पश्‍चिम बंगाल के सीएम विधानचंद्र राय को काला  झंडा दिखाने के आरोप में जेल भी गए थे। वहाँ उनकी मुलाक़ात चारू मजूमदार से हुई जो माओं के परम भक्तों में से एक थे |

दोनों ने  बाहर आ कर सरकार और व्‍यवस्‍था के खिलाफ सशस्‍त्र विद्रोह का रास्‍ता चुना। आज जिस नक्सलवाद से हम जूझ रहे हैं उसकी शुरूआत पश्चिमी बंगाल के गावँ नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आन्दोलन की विचार धारा से हुई इसके जनक भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के चारू मजूमदार और कानू सन्याल थे | यह विचार धारा लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरूद्ध है इनका मानना हैं भारत में मजदूरों और किसानों की बदहाली के लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं क्योंकि सत्ता एवं प्रशासन पर उच्च वर्ग ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था का लाभ उठा कर कब्जा जमा लिया हैं अत: एक सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा ही न्याय विहीन व्यवस्था को बदल कर “वंचितों और शोषितों के अधिकारों की रक्षा होगी’ क्या वह नहीं जानते थे ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध गांधी जी के नेतृत्व में अहिंसा और आत्म शक्ति के हथियार से सत्ता लेकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना की थी ?

कानू ने 1967 में नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की थी | नक्सलवादी विचारकों नें कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल  भारतीय समन्वय समिति बनाई और अपने आप को भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग कर सरकार के विरुद्ध अंदर ग्राउंड हो कर सशस्त्र क्रान्ति की शुरुआत की थी लेकिन कानू और चारू के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे और दोनों ने अपनी अलग राहें चुन कर अलग पार्टियों के साथ संबंध जोड़े अब विचार धारा के समर्थक चुनाव जीत कर संसद में भी पहुंच गये हैं वह जानते हैं भारतीय जन मानस की समझ में गोली बंदूक खून खराबा भाषा नहीं आती | नक्सलवादी विचार धारा से न गरीब जिन्हें यह वंचित कहते हैं को लाभ हुआ न विचारधारा के समर्थकों को हाँ कई राज्यों में हिंसा से सैकड़ों निर्दोषों की जान अवश्य गयी | आंदोलनों ने मुख्यतया आदिवादी क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाया| नक्सलवाद के पनपने का कारण गरीबी और विकास का न होना माना जाता है जिससे यहाँ के निवासियों में असंतोष पनपता है जबकि यहाँ विकास की गति धीमी रहने का कारण नक्सलियों के हमले खून खराबा हैं| सुकमा के इलाके में सड़क निर्माण का विरोध नक्सलवादी कर रहे हैं वह चाहते हैं अशिक्षा गरीबी बनी रहे, साथ देने वाले नौजवान मिलेंगे जिनके हाथ में बंदूक पकड़ा कर आदिवासियों के स्त्री बच्चों को आगे रख कर तांडव मचाया जा सके हाल ही में यही हुआ सीआरपीएफ के जवानों को धोखे से घेर कर मार डाला इसके लिए आदिवासियों की महिलाओं और बच्चों का घेरा बना कर हमला किया गया सर्वे के अनुसार विश्व में नक्सलवाद को चौथा आतंकवादी संगठन माना जाता है अपने लोग हैं सरकार खत्म करने के लिए सख्ती बरतने से संकोच करती है |

नक्सली लड़ाकों के पास अत्याधुनिक हथियार हैं धन की भी कमी नहीं है देश को कमजोर करने के लिए उन्हें विदेशों से भी मदद मिलती है | जंगलों में रह् कर महिला और पुरुषों के नक्सली संगठन सशस्त्र दलों से लड़ रहे हैं  जानते हैं नक्सली सिर्फ जंगलों में नहीं रहते। उनके  समर्थक सफेद पोश शहरों और राजधानी में रह कर नक्सलवाद के लिए समर्थन जुटाते है सुकमा में नक्सली हमले के बाद से पूरे देश में गुस्सा  और इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर जड़ से उखाड़ने की मांग हो रही है सफेद पोश नक्सलियों का गुट इतना मजबूत है सरकारे इनके खिलाफ कार्रवाई करने से डरती हैं।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
May 12, 2017

श्री डॉ कुमारेंदु जी अतिशय धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
May 13, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! अत्यंत सार्थक और विचारणीय लेख ! आपसे सहमत हूँ कि नक्सली समर्थक बहुत से सफेद पोश शहरों और राजधानी में रह कर नक्सलवाद के लिए समर्थन जुटाते है ! तभी उनके पास काफी धन और आधुनिक हथियार हैं ! आजकल में पेज का पोर्टल अपडेट नहीं हो रहा है, इसलिए किसी ब्लॉगर मित्र के नए लेख कि जानकारी भी नहीं मिल पा रही है ! अच्छी प्रस्तुति हेतु बधाई !

Shobha के द्वारा
May 14, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी सब कुछ मानवाधिकार की आड़ में हो रहा है लेख पढने के लिए धन्यवाद उदासीनता देख रहें हैं परन्तु क्या कर सकते हैं

yamunapathak के द्वारा
May 15, 2017

आदरणीया शोभा जी सादर नमस्कार आपके ब्लॉग बहुत तथ्य परक होते हैं .नक्सलवाद विकास की कमी का परिणाम है या कारण … सच है कि हिंसा के भय से ना कोई विद्यालय चल पाते हैं ना कोई कारखाना . एक बहुत ही अच्छा ब्लॉग साभार

Shobha के द्वारा
May 16, 2017

प्रिय यमुना जी राज्य सरकारे आदिवासियों का भला करना चाहतीं हैं लेकिन नक्सलवाद एक रोजगार बन गया है अपने लोग हैं उन् पर सरकार बल प्रयोग करने में संकोच करती हेंलेख पढने और उस पर चिन्तन करने के लिए अति धन्यवाद

drAKBhardwaj के द्वारा
May 18, 2017

नक्सवाद एक ऐसी समस्या है जिससे सख्ती से लड़ा जा सकता कोबरा कमांडों की मदद से नक्सलवादियों को दबाने की कोशिश की जा रही है

Shobha के द्वारा
May 18, 2017

धन्यवाद डाक्टर साहब सही लिखा है आपने


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