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15वें उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और राज्यसभा

Posted On: 9 Aug, 2017 Politics में

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भारत के राष्ट्रपति कार्यपालिका अध्यक्ष हैं। उनके बाद दूसरा महत्वपूर्ण पद उपराष्ट्रपति का है, वे राज्यसभा के सभापति हैं। वर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी दो कार्यकाल पूरा करने के बाद अब अपने पद से रिटायर्ड  हो रहे हैं। उनका स्थान वैंकेया नायडू ग्रहण करेंगे। वे भारत के 15वें उपराष्ट्रपति हैं। उपराष्ट्रप्ति पद के चुनाव में संसद के दोनों सदन भाग लेते हैं। उम्मीदवार का नाम 20 मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित किया जाता है और 20 मतदाता समर्थन करते हैं। उम्मीदवार 15,000 रुपये जमानत के तौर पर जमा करते हैं। नायडू का मुकाबला यूपीए के गोपाल कृष्ण गांधी से था। विपक्ष ने मिलकर गोपाल कृष्ण गाँधी को अपने उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतारा। गोपालकृष्‍ण, महात्मा गाँधी के पौत्र और जाना माना चेहरा थे। एनडीए ने उनके मुकाबले वेंकैया नायडू को चुनाव में उतारा। उनकी जीत सुनिश्चित थी। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी से दोगुने से अधिक वोट प्राप्त किए। उनके लिए क्रॉस वोटिंग भी हुई।


venkaiah naidu


नायडू आन्ध्रप्रदेश के किसान परिवार से भारत के दूसरे सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं, यही भारत के लोकतंत्र की विशेषता है। जीत हासिल करने के बाद अब वे दलगत राजनीति से अलग देश के उपराष्ट्रपति हैं। उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष है। राज्यसभा का सभापति होना, सदन चलाना बहुत बड़ा चैलेंज है। इस दायित्व को निभाना आसान नहीं है। नायडू मिलनसार व्यक्ति हैं। उनकी विपक्षी दलों के सांसदों पर भी अच्छी पकड़ और उनसे दोस्ताना व्यवहार है। काफी समय से राज्यसभा में अधिकतर शोर होता रहता है। विपक्ष बहस के मूड में नहीं रहता। कई बार सदन की कार्यवाही बाधित होती है। एनडीए के पास अभी राज्यसभा में बहुमत नहीं है, हालांकि कुछ समय बाद बहुमत हो जायेगा। अभी सरकारी विधेयक पास कराना मुश्किल हो जाता है। संख्या बल की कमी से महत्वपूर्ण विधेयक भी लटक जाते हैं। यदि महत्वपूर्ण सरकारी विधेयक को अमेंडमेंट के साथ राज्यसभा पास कर दे, तो सरकार की किरकिरी होती है। विधेयक को फिर से लोकसभा में पेश करना पड़ता है।


राज्यसभा के सांसद उपसभापति का चुनाव करते हैं। यहां भाजपा का संख्या बल कम है। प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत दल का नेता होते हैं। वे उसी के प्रति उत्तरदायी हैं, लेकिन वे राज्यसभा के सदस्य भी हो सकते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह राज्यसभा के सदस्य थे। दिवंगत संगमा ने सुझाव दिया था कि प्रधानमंत्री को लोकसभा का सांसद होना चाहिये, हालांकि उनके इस सुझाव को शोर में उड़ा दिया गया था।


25 नवम्बर 2001 को सर्वदलीय राष्ट्रीय सम्मेलन में संसद एवं विधानसभाओं को मर्यादित करने के लिए नियम बनाकर आचार संहिता बनाई गयी थी, जैसे…

1. प्रश्नकाल के दौरान शांति बनाये रखना

2. सदन के बीच में अपने स्थान से उठकर नारेबाजी न करना

3. राष्ट्रपति के भाषण के दौरान मर्यादित व्यवहार करना

4. प्रत्येक सांसद अपनी सम्पत्ति की घोषणा करें

5. जब कोई सदस्य भाषण दे रहा है, तो उसके विचार सुनना, टोका टिप्पणी न करना

6. सदन में फोन का इस्तेमाल न करना

7. बिना स्पीकर को सूचित किये किसी पर आरोप लगाकर उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल न करना

8. न्यायालय में चलने वाले विषयों को बिना अनुमति के सदन में न उठाना

9. अध्यक्ष जी की अनुमति से अपनी बात रखना। इसके अलावा और भी कई नियम हैं, लेकिन व्यवहार में अब भी इससे विपरीत होता है।


सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी है, सबका सहयोग लेकर सदन चलाएं, परन्तु कैसे? कांग्रेस अधिकतर सत्ता में रही है, उसके कार्यकाल में होने वाले घोटालों के विरुद्ध कोई आवाज न उठे, चर्चा न हो, कैसे संभव है, सत्तापक्ष मौका क्यों चूकेगा? सांसद वेल में आकर शोर मचाते हैं। राज्यसभा का कोरम भी कम रहता है। कई बार सदन में अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ऐसी बात कही जाती है, जिसे सदन से बाहर कहने पर मानहानि का मुकदमा चल सकता है। ऐसे आपत्तिजनक विषय को कार्यवाही से हटाने के लिए सदन में शोर मचता है।


सपा सांसद नरेश अग्रवाल ने हाल ही में राज्यसभा में अपने भाषण में धार्मिक विषय पर अपमानजनक टिप्पणी की, जिसका सत्तापक्ष द्वारा विरोध हुआ। मांग थी कि वे माफ़ी मांगें। उनकी टिप्पणी को कार्यवाही से हटाया गया। इसलिए यदि सत्तापक्ष का अपना सभापति है, तो आसानी रहती है। राज्यसभा, लोकसभा के समान ही दूसरा सदन है। इसे उच्च सदन कहते हैं। लोकसभा की भांति राज्‍यसभा को भी अधिकार प्राप्त हैं। केवल वित्त विधेयक पर अधिकार नहीं है। लोकसभा में पास होने के बाद वित्त विधेयक राज्यसभा में केवल 14 दिन के लिए पेश किया जाता है। वित्‍त विधेयक पर बहस होती है, सुझाव भी दिए जाते हैं। इन सुझावों को लोकसभा माने या न माने, इसके लिए राज्यसभा के सांसद बाध्य नहीं कर सकते। वित्त विधेयक राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर होने के लिए जाता है।


लोकसभा में पास विधेयक राज्यसभा में जाते हैं, यहाँ भी विधेयक को लोकसभा की तरह तीन वाचनों से गुजरना पड़ता है। प्रथम वाचन में विधेयक की रूपरेखा स्पष्ट की जाती है। द्वितीय वाचन में बहस होती है। तृतीय में सुझाव। सरकार माने या न माने, फिर मतदान। राज्यसभा में भी विधेयक प्रस्तुत किये जाते हैं, लेकिन ज्यादातर महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत होते हैं।


प्रश्नोत्तर काल में विभागीय मंत्री और प्रधानमंत्री से प्रश्न पूछने का अधिकार है। मोदी जी की आंधी में काफी दिग्गज नेता हार गये। उनमें कई नेता राज्यसभा के सांसद हैं। वेंकैया नायडू के राज्यसभा के सभापति बनने के बाद प्रश्नों की संख्या में बढ़ोतरी होने वाली है। बहस होती है या वॉकआउट। राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ देर बाद सांसद अपनी असहमति प्रकट करने वेल में आ जाते हैं। विधेयक को फाड़ना, नारेबाजी करना, सदन में चर्चा के लिए पहले सहमति देना, लेकिन चर्चा के दौरान अपनी बात कहकर दूसरे पक्ष को सुने बिना ही  सदन से वॉकआउट करना, आमतौर पर ऐसा ही देखने को मिलता है।


कांग्रेस  अध्यक्ष के सुझाव पर कांग्रेसी सांसद आक्रामक रुख अपनाये हुए हैं। राज्यसभा की कार्यवाही को भी टेलीविजन  के माध्यम से पूरा देश देखता है। किसी भी बहस के विषय को भटकाना आम बात है। ऐसे शोर में सभापति महोदय राज्यसभा की कार्यवाही को रोक देते हैं, लेकिन वेंकैया नायडू ऐसा नहीं होने देंगे या नियमानुसार सदन को चलवाने की कोशिश करेंगे। संविधान में संशोधन के लिए दोनों सदनों को समान अधिकार है। अर्थात संशोधन दो तिहाई बहुमत से दोनों सदनों में पास होना चाहिए। यदि संशोधन बिल राज्यसभा में पास होना मुश्किल है, तो ऐसे में सरकार दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकती है। मगर अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती है।


राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी सदस्य संख्या 250 है। इसे लोकसभा से अलग शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। तीन सूचियों में कानून बनाने के लिए अधिकारों का बंटवारा संविधान में किया गया है। केंद्र सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। राज्य सूची के किसी विषय को राज्यसभा द्वारा दो तिहाई बहुमत से राष्ट्रीय महत्व का घोषित करने पर संसद उस पर कानून बना सकती है। संसदीय व्यवस्था संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन से ली है, वहाँ भी हाउस ऑफ लार्ड है, लेकिन लार्ड्स के अधिकार कम हैं, अधिकतर वह बहस ही करते हैं। मगर अपने यहां राज्यसभा का महत्व और शक्तियाँ लोकसभा से कमतर नहीं हैं। इसलिए वेंकैया नायडू का सभापति होना सत्तापक्ष के हित में रहेगा। देश चाहता है सदन चले।

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
August 16, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! बहुत अच्छी जानकारी आपने दी है ! उम्मीद है कि वैकैया नायडू पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए एक बेहतर और निष्पक्ष सभापति साबित होंगे ! सादर आभार !

Abhijati के द्वारा
August 16, 2017

 आदरणीय शोभा जी एक किसान का बेटा भारत के दूसरे उच्च पद पर पहुंचना ख़ुशी की बात है

Shobha के द्वारा
August 17, 2017

अभिजात जी यह भारत की डेमोक्रेसी की विशेषता है


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