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विदेश नीति में गांधीवाद की समाप्त होती अहमियत!

Posted On: 31 Oct, 2017 Politics में

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China1


भारत के दो पड़ोसी देश जिनसे देश की कई किलोमीटर सीमा मिलती है दोनों ही दुश्मन हैं। देश दो तरफा संघर्ष झेल रहा है। पाकिस्तान द्वारा बढ़ती आतंकी गतिविधियाँ और चीन द्वारा पाकिस्तान का समर्थन करना, चीन का भारत से सीमा विवाद। भूटान के क्षेत्र डोकलाम पठार में चीन ने सड़क बनाने की कोशिश की, क्षेत्र भारत के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है यदि सड़क बन जाती, तो चीन भारत के बीस किलोमीटर चौड़े मार्ग जो चिकननेक कहलाता है, तक पहुंच जाता।


चिकननेक भारत को नार्थ ईस्ट से जोड़ता। इससे यहाँ चीन अपना प्रभाव बढ़ा लेता। लगभग 73 दिन तक दोनों देशों में तनाव रहा। चीन दक्षिण चीन सागर पर भी दावा करता है। उसका वियतनाम ,जापान और फिलिपीन से भी विवाद है। भारत को वह हिंदमहासागर में चारों तरफ से घेरना चाहता है। मिडिल ईस्ट पर अधिकार बढ़ाकर क्षेत्र के तेल ,गैस व आयरन के भंडार पर कब्जा चाहता है। वह विश्व की सुपर पावर बनने की राह पर है|


पाकिस्तान की विदेश नीति के केंद्र में सदैव भारत रहा है। आर्थिक स्थिति खराब है फिर भी कश्मीर के अलगाववादियों के लिए अलग बजट है। धन बल का सहारा लेकर पढ़ने वाले छात्रों के हाथ में पत्थर पकड़ा दिये, वह सुरक्षा बलों पर पथराव करते हैं। भारत के खिलाफ छद्म युद्ध निरंतर चलता है। गोलाबारी की आड़ में, रात के अँधेरे में पाकिस्तान से आतंकियों की खेप निरंतर योजना बद्ध तरीके से सीमा में प्रवेश करती है।


इंसानों का कत्ल करना व भारतीय सैनिक छावनियों पर आतंकी हमला करना, जेहाद है। पाकिस्तानी बार्डर एक्शन फ़ोर्स दो सैनिकों के सिर काट कर ले गये। जेहादी मानसिकता से ग्रस्त मौत को जन्नत समझने वाले आतंकियों का इलाज क्या हो सकता है? शांति की भाषा आतंकी आकाओं को कैसे समझा सकते हैं, जबकि पाकिस्तान अपने नागरिकों (आतंकियों) के शव लेने से भी साफ़ इंकार करता है। लेकिन हमारी सरकार की नीति अलग है। मौलवियों द्वारा विधिवत् उनका अंतिम संस्कार कराया जाता है। क्या ऐसे वहशी, धर्म के नाम पर आतंक फैलाने वालों को भारत की भूमि में कब्र मिलनी चाहिए?


गांधी जी 21 वर्ष बाद दक्षिणी अफ्रीका से भारत लौटे। प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत थी। गांधी जी ने ब्रिटेन द्वारा जर्मन सम्राट विलियम कौसर की साम्राज्यवादी नीति के खिलाफ लड़ने का समर्थन किया। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के समय महात्मा गाँधी समझ चुके थे कि बिर्टिशर हमें आजादी नहीं देंगे। अत: क्यों न अवसर का लाभ उठाया जाये। पूर्ण स्वतन्त्रता हमारा हक है। उन्होंने देशवासियों को करो या मरो का नारा दिया।


15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। आजादी के साथ ही कश्मीर वैली पर अधिकार करने के लिए पाकिस्तान ने कबायलियों की फौज भेज दी। कश्मीर के राजा हरी सिंह की प्रार्थना पर भारतीय सेनायें कश्मीर वैली पहुंची। श्रीनगर की रक्षा हो गयी, लेकिन लार्ड माउन्टबेटन भारत के आखिरी गवर्नर जनरल के प्रभाव में नेहरू जी कश्मीर की समस्या को यूएन में ले गये। गाँधी जी का पाकिस्तान की इस हरकत पर भी अहिंसा के सिद्धांत से विश्वास नहीं उठा। वे एक ऐसे भारत और पाकिस्तान की कल्पना कर रहे थे, जहां दोनों देश प्रेम से रहें।


गांधी जी की हत्या हो गयी, लेकिन गाँधीवादी अध्याय समाप्त नहीं हुआ था। द्वितीय युद्ध के अंत के बाद विश्व दो भागों में बंट गया। एक ओर वारसा पैक्ट के मेंबर दूसरी तरफ मित्रराष्ट्र अमेरिकन गुट। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। हमारी विदेश नीति का मुख्य सिद्धांत पंचशील था। हर देश की सम्प्रभुता की रक्षा की जायेगी, किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्ताक्षेप न हो। हमारी सांस्कृतिक विरासत, हजारों वर्ष पुराने इतिहास में शान्ति अहिंसा और सहनशीलता में ही विश्व कल्याण संभव है, की भावना रही है। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में विश्वास, यही हमारी विदेश नीति है।


मगर क्या हम शांति से रह सके? चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। यह भारत-चीन के बीच में तटस्थ प्रदेश था। श्री दलाईलामा के साथ तिब्बती शरणार्थियों ने भारत में शरण ली, लेकिन नेहरू जी के संबंध चीन से बढ़ते रहे। भारत में हिंदी-चीनी भाई -भाई के नारे लगे। उसी भाई ने 1962 में भारत की पीठ में छुरा भोंका। भारत के एक भू-भाग पर कब्जा कर स्वयं ही युद्ध विराम की घोषणा की।


यह देश की अहिंसात्मक सोच पर आघात था। गाँधीवाद इस संबंध में मौन ही है। अमेरिकन ऐड और भारत के चीन के सामने घुटने टेकने की स्थिति का फायदा उठाते हुए 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। जवाबी कार्रवाई में हमारी सेनाओं ने लाहौर सियालकोट का बार्डर खोलकर वह कर दिखाया, जिसकी पाकिस्तान ने कल्पना भी नहीं की थी। लाहौर से भारतीय सेनायें केवल 16 किलोमीटर दूर शहर में प्रवेश करने में समर्थ थीं, लाहौर भारतीय तोपों की जद में था |


लार्ड माउंटबेटन ने भविष्यवाणी की थी कि पाकिस्तान के दो हिस्से 25 वर्ष में अलग हो जायेंगे। पाकिस्तान में होने वाले चुनाव में मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन भुट्टो किसी भी तरह सत्ता को हाथ से जाने नहीं दे रहे थे। जिन्हें प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होना था, उन्हें जेल में डाल दिया गया। यहीं से पाकिस्तान के विभाजन की नींव पड़ गई।


मुजीब-उर-रहमान ने हर नागरिक को बंग्‍लादेश के निर्माण में सहयोग देने का आह्वान किया। 1971 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरनल याहिया खान थे। उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के हालात सुधारने की जिम्मेदारी जरनल टिक्का खान को सौंप दी। 26 मार्च से पूर्वी पाकिस्तान में ऐसा खूनी संघर्ष हुआ कि स्त्रियों तक को नहीं बख्शा गया।


पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी सेना का गठन किया गया, जिसके सदस्य आधिकतर बंगलादेश का बुद्धिजीवी वर्ग और छात्र थे। उन्होंने भारतीय सेना की मदद से अपनी भूमि पर पाकिस्तानी सेना से संघर्ष किया। अंत में पाकिस्तानी सेना का मनोबल इतना गिर गया कि जनरल नियाजी ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, 93,000 युद्ध बंदी। साउथ ईस्ट एशिया में नये राष्ट्र का उदय हुआ ‘बांग्‍लादेश’ जिसको भारत सरकार ने मान्यता दी।


पाकिस्तान की विदेश नीति में जबर्दस्त बदलाव आया। वह जानते थे कि युद्ध में भारत को हराना आसान नहीं है। अत: अफगानिस्तान की समस्या हल हो जाने के बाद आतंकी संगठन लश्करे तैयबा का रुख भारत की तरफ मोड़ दिया। इन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद प्राप्त है। इस्लामिक स्टेट की विचारधारा के बाद आतंकवाद विश्व की समस्या बन चुका है। समय की जरूरत को देखते हुए भारत की विदेश नीति भी बदली है। डॉ मनमोहन सिंह जी के समय से ही प्रो अमेरिकन हो रही है। देश को निवेश की जरूरत है और दुनिया के देश भारत को बाजार के रूप में देख रहे हैं।


19 फरवरी 1999 को अटल जी ने दिल्ली से लाहौर की बस सेवा शुरू की। वह और कई नामी हस्तियां बस के प्रथम यात्री थे। सम्बन्ध सुधारने का राजनीतिक कदम अच्छा प्रयत्न था। यात्रा की बहुत चर्चा हुई, लेकिन परिणाम करगिल युद्ध, 13 दिसम्बर 2001 में भारतीय संसद पर आतंकवादी हमला हुआ। शायद नागरिकों को आतंकी बनाते-बनाते पाक नेतृत्व आदिम काल में पहुंच रहा है।


पकिस्तान न शांति से जीता है न भारत को शांति से विकास की राह पर चलने देता है। वहां चार शक्तियां देश चलाती हैं। जनता द्वारा चुनी सरकार है, सेना, आईएसआई और हाफिज सईद जैसे दबाव समूह, जिनकी रूचि देश कल्याण की अपेक्षा जेहाद में अधिक है। अब तो वह सत्ता पकड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश की नौजवान पीढ़ी को भारत के खिलाफ भड़का कर आतंकवाद के रास्ते पर ले जाना उनका उद्देश्य है। गांधीवादी विचारधारा आतंकियों या आतंकी आकाओं के सामने बेकार है। सरकार ने सख्त नीति अपनाकर सुरक्षाबलों को आतंकियों को मारने का अधिकार दिया। सर्जिकल स्ट्राइक कर आतंकियों में भय पैदा किया। क्या शठ के साथ शठ जैसा व्यवहार नहीं होना चाहिये? यही कूटनीति है।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! अच्छे और पठनीय लेख के लिए सादर अभिनन्दन और हार्दिक बधाई ! गांधी दर्शन यानि अहिंसा की अहमियत सदा रही है और सदैव रहेगी ! युद्ध के बाद भी तो शान्ति के लिए वार्ता ही होती है ! आजकल आप कम लिख रही हैं ! फेसबुक पर आपकी यात्राओं वाली तस्वीरें देखीं ! महात्मा गांधी के पौत्र से भी आप मिलीं, बहुत अच्छा लगा ! जीन्यूज पर भी आप दिखीं ! बहुत बहुत बधाई ! शुभकामनाएं !

Shobha के द्वारा
October 31, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी लेख पढने के लिए धन्यवाद गाँधी वादी दर्शन उच्च कोटि का दर्शन है लेकिन सामने वालों की समझ है गाँधी ही की हत्या के बाद उनको श्रद्धांजली देते समय जिन्ना ने विशेष रूप से हिन्दू लीडर लिखवाया जबकि उनके सलाहकार ने उनसे कहा था गाँधी जी की वजह से पाकिस्तान ने सरवाईव किया था उन्होंने हमें रेवेन्यू दिलवाया था केवल जेहादी मानसिकता के आगे गाँधी वाद फेल है

Shobha के द्वारा
October 31, 2017

गाँधी जी का हृदय बहुत विशाल था वह नहीं चाहते थे जब ब्रिटेन द्वितीय युद्ध लड़ रहा है उनके सामने कोइ डिमांड रखी जाए लेकिन सरदार पटेल नि उन्हें समझाया यही उचित समय है जब हमें देश व्यापी आन्दोलन द्वारा पूर्ण स्वराज्य की मांग करनी चाहिए तब अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ शास्त्री जी ने भी आन्दोलन को नया रूप दिया था अंग्रेजों को हमें आजाद करना ही पड़ेगा गाँधी जी कभी भी अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते से विचलित नहीं हुए हमने भी शान्ति और सौहार्द को भारत की विदेश नीति का मूल मन्त्र माना

अंजना भागी के द्वारा
November 1, 2017

प्रिय दी विदेश नीति में बदलाव या गाँधी वाद को मान्यता या महत्व न देने से गांधीवादी विचार धारा का महत्व कम नहीं होता

Shobha के द्वारा
November 1, 2017

प्रिय अंजना जी सही लिखा है आपने लेकिन भारत की विदेश नीति आतंकवादियों की निरंतर बढती गतिविधियों से प्रभावित हो रही है

sadguruji के द्वारा
November 6, 2017

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! साप्ताहिक सम्मान से सम्मानित किये जाने पर बहुत बहुत बधाई ! लोंगो का रुझान जाने क्यों अब ब्लॉग जगत से हटकर सोशल मीडिया की तरफ भाग रहा है ! अच्छे लेखक अब ब्लॉग लिखने की बजाय फेसबुक और ट्विटर पर अपने विचार रखने में ज्यादा रूचि ले रहे हैं ! लेखन सभी अच्छी मित्रता है, जिससे मन को शांति और समाज को सिख मिलती है ! सादर आभार !

harirawat के द्वारा
November 6, 2017

शोभा जी मैंने आपका लेख पढ़ा, आपने हर तथ्य को ऐसे उजागर किया जैसे आप हरघटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे हों ! हर जानकारी में सचाई है ! सबसे बड़ी गलती बंटवारा था, अगर बंटवारा होही गया था, तो पाकिस्तान से काट काट का शव गाडी से भारत भेजे जा रहे थे, इधर गांधीजी किसी भी मुसलमान को पाकिस्तान नहीं भेजना चाहते थे, “अहिंसा प्रमाणधर्मा” ! जब पाकिस्तान मुसलमानों के लिए और हिन्दुस्तान हिन्दुओं के लिए बंटवारा किया था तो सभी मुसलमान पाकिस्तान जाने चाहिए थे, काश्मीर में १९४८ में भारतीय फ़ौज जीत के कगार पर थी, लेकिन नेहरू जी ने जबरन बीच में ही सीज फायर करवा दिया, साथ ही सेना की संख्या भी कम करदी, यह कहकर की “हम शांति पसंद हैं, हमारकोई शत्रु नहीं है, पुराने हथियार जंक लगे बची हुई सेना के पास थे, चीन ने हिन्दुस्तान की इसी कमजोरी का लाभ उठाया और जो हुआ वह पूरे भारत को पता है !

Shobha के द्वारा
November 12, 2017

श्री रावत जी पाकिस्तान की नीति आज उनको ही बर्बाद कर रही है आतंकी आका सत्ता हाथ में लेने को तैयार हैं भारत दो दो दुश्मनों से अड़ने के बाद भी तरक्की कर रहा है पकिस्तान अपनी बर्बादी का स्वयम जिम्मेदार हो रहा है जी सही है चीन ने हमारी नरमी नेहरू जी उसे न समझने की की भूल से हमने धोखा खाया था इतिहास लौट नहीं सकता अब वर्तमान के साथ जीना है


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